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अध्याय 8 — अष्टम अध्याय

मनुस्मृति
420 श्लोक • केवल अनुवाद
व्यवहार अर्थात्‌ मुकदमों को देखने का इच्छुक राजा (आगे कहे जाने वाले लक्षणों से युक्त) ब्राह्मणों तथा पूर्वोक्त पञ्चाङ्गों से युक्त मन्त्रों को जानने वाले मन्त्रियों के साथ नम्रभाव से (वचन, हाथ, पैर तथा नेत्रादि की चञ्चलता से रहित होकर) राजसभा (न्यायालय) में प्रवेश करे।
(राजा) वहाँ पर अर्थात्‌ न्यायालय में बैठकर या खड़ा होकर दाहिने हाथ को उठाकर विनम्र वेष-भूषा से युक्त होकर कार्यॉर्थियों के कार्यों को देखे।
अट्टारह (८।४-७) व्यवहार-मार्गो के कार्यो को देश, जाति तथा कुल के व्यवहारों से और साक्षी, द्रव्य आदि कारणों से प्रतिदिन पृथक्‌-पृथक्‌ विचार करे।
१. ऋण लेना, २. धरोहर (थाती) रखना, ३. किसी वस्तु या भूमि आदि का स्वामी न होने पर भी उसे बेच देना, ४. अनेक व्यक्तियों (व्यापारी आदि) का मिलकर संयुक्त रूप से कार्य करना, ५. दान आदि में दी गयी सम्पत्ति या किसी वस्तु को क्रोध, लोभ या अपात्रता के कारण वापस ले लेना,
६. नौकरों का वेतन या मजदूरों की मजदूरी नहीं देना, ७. पूर्व निर्णीत व्यवस्था (सन्धिपत्रादि) को नहीं मानना, ८. क्रय-विक्रय (खरीदना-बेचना) में विवाद उपस्थित होना, ९. स्वामी तथा पालक रखवाली करने वाले में परस्पर विवाद होना,
१०. सीमा के विषय में विवाद होना, ११. दण्डःपारुष्य (अत्यधिक मार-पीट करना), १२. वाक्पारुष्य (अनधिकार गाली आदि देना), १३. चोरी करना, १४. अतिसाहस करना, (डाका डालना आग लगाना आदि), १५. सत्री का परपुरुष के साथ सम्भोग आदि करना,
१६. स्त्री-पुरुष का धर्म, १७; पैतृक (पिता के) धन-सम्पत्ति या भूमि आदि का बटवारा करना और १८ जुआ खेलना या द्रव्यादि रखक्रर (बाजी लगाकर अर्थात्‌ दाँव पर धन आदि लगाकर) पशु (भेंडा, भेंसा आदि), पक्षी (मुर्गा, तीतर, बटेर आदि) को लडाना ये १८ स्थान व्यवहार (मुकदमे) की स्थिति में कहे गये हैं । राजा इन व्यवहार-स्थानो में (मुकदमो के विषयों में इसी प्रकार के अन्यान्य विवादस्थ विषयों में भी) परस्पर विवाद करते (झगड़ते) हुए लोगों के वंशादि-क्रमागत नित्यधर्म का विचारकर निर्णय (न्याय) करे।
यदि राजा स्वयं विवादों (मुकदमों) का न्याय (फैसला) न करे तो उस कार्य को देखने के लिए विद्वान्‌ ब्राह्मण को नियुक्त करे।
वह (राजा के द्वारा नियुक्त विद्वान्‌ ब्राह्मण) भी तीन सदस्यों (धार्मिक एवं कार्यज्ञ ब्राह्मणों) के साथ ही न्यायालय में जाकर आसन पर बैठकर या खड़ा होकर (राजा के देखने योग्य उन) कार्यो को देखे अर्थात्‌ उन मुकदमों का फैसला करे।
जहाँ पर वेदज्ञ (ऋक, यजुष्‌ तथा सामवेद के ज्ञाता) तीन ब्राह्मण तथा राजा से अधिकार-प्राप्त विद्वान्‌ ब्राह्मण बैठते हैं, उसे (विद्वान्‌ लोग चतुर्मुख अर्थात्‌ ब्रह्मा की सभा के समान) 'सभा' कहते हैं।
जिस सभा (न्यायालय) में धर्म (सत्य भाषण) अधर्म (असत्य भाषण) से पीड़ित होकर रहता है अर्थात्‌ असत्य बात कहकर सच्ची बात छिपायी जाती है, (और सभा में स्थित सदस्य) वे ब्राह्मण इस धर्म-पीडाकारक शल्य को दूर नहीं करते अर्थात्‌ असत्य पक्ष को छोड़कर सत्य पक्ष का आश्रय नहीं लेते, सभा में (सदस्य अर्थात्‌ न्यायाधीश रूप से) स्थित वे ब्राह्मण ही अधर्मरूपी शल्य से विद्ध (पीड़ित) होते हैं।
या तो सभा (न्यायालय) में जाना ही नहीं चाहिये, या वहाँ जाकर सत्य ही बोलना चाहिये । सभा में जाकर कुछ नहीं कहता हुआ अर्थात्‌ विवाद-विषय को जानकर भी किसी के भय से या पक्ष लेकर सत्य भाषण को छिपाने के उद्देश्य से कुछ नहीं कहता हुआ मनुष्य तत्काल पापभागी होता है।
जिस सभा (न्यायालय) में सभासदों (न्यायाधीशों जज; मजिस्ट्रेट आदि) के सामने (अर्थी तथा प्रत्यर्थी अर्थात्‌ क्रमश: मुद्दई और मुद्दालह दोनों के द्वारा या इनमें से किसी एक के द्वारा) धर्म-अधर्म से तथा सत्य-असत्य से पीड़ित होता (छिपाया जाता) है, उस सभा में वे सदस्य ही पाप से नष्ट होते हैं (अत: उनका कर्त्तव्य है कि वे असत्य बोलने वालों को दण्डित करें)।
नष्ट किया गया धर्म ही (इष्ट-अनिष्ट के साथ) नष्ट करता है और सुरक्षित धर्म ही (इष्ट-अनिष्ट के साथ) रक्षा करता है, अत एव धर्म को (असत्य भाषण से) नष्ट नहीं करना चाहिये; क्योंकि नहीं नष्ट हुआ अर्थात्‌ सुरक्षित धर्म ही नहीं मारता (रक्षा करता) है, अथवा - “नष्ट हुआ धर्म हम लोगों को नष्ट नहीं करे” यह जानकर धर्म को नष्ट नहीं करना चाहिये (अपितु असत्य भाषण करने वाले को दण्डित कर भाषण के द्वारा धर्म की रक्षा करनी चाहिये)।
भगवान धर्म को “वृष” (काम अर्थात्‌ मनोभिलषित को बरसानेवाला) कहते हैं, जो मनुष्य उसका वारण (नाश) करता है, उसे देवता लोग वृषल' (धर्म को लेने या काटने वाला) अर्थात्‌ शूद्र कहते हैं, अतएव धर्म का नाश न करे।
इस संसार में एक धर्म ही मित्र है, जो मरने पर भी साथ जाता है और सब (स्त्री, पुत्र, धन, धान्यादि सम्पत्ति) तो शरीर के साथ ही नष्ट हो जाते है।
व्यवहार (मुकदमे) को ठीक न देखने पर (न्यायाधीश के उचित न्याय न करने पर) अधर्म का प्रथम चतुर्थांश अधर्म करने वालों को, द्वितीय चतुर्थांश गवाह (साक्षी) को, तृतीय चतुर्थांश सदस्यों (न्यायाधीशों राजा द्वारा नियुक्त जज, मजिस्ट्रेट आदि) को तथा चतुर्थ चतुर्थांश राजा को मिलता है।
जिस सभा (न्यायालय = कचहरी) में निन्दनीय अर्थी (मुद्दई) तथा प्रत्यर्थी (मुद्दालह) निन्दित अर्थात्‌ न्यायपूर्वक दण्डित होता है, उस सभा में पापकर्ता ही पापभागी होता हे और राजा तथा सभासद (न्यायाधीश) को दोष नहीं लगता । अतएव राजा का कर्तव्य है कि वह धर्मात्मा सभासदों को इस काम में नियुक्त करे तथा सभासदों का कर्तव्य है कि वे धर्म को लक्ष्यकर अपराध के अनुसार अपराधी को दण्डित करे)।
केवल जाति (ब्राह्मणमात्र) होने से अन्य जाति की जीविका करनेवाला अर्थात्‌ ब्राह्मण की वृत्ति को छोड़कर जीवन-निर्वाह के लिए क्षत्रिय या वैश्य का कार्य करनेवाला अथवा (ब्राह्मणत्व में सन्देह होने पर भी) अपने को ब्राह्मण कहनेवाला किसी व्यवहार (मुकदमें) को देखने में राजा का धर्मप्रवक्ता (न्यायाधीश) हो सकता है, किन्तु किसी प्रकार (ब्राह्मण का कर्म करता हुआ या धर्मात्मा) भी शूद्र धर्मप्रवक्ता नहीं हो सकता।
जिस राजा के राज्य के विचार शूद्र करता है; उस राजा के देखते-देखते उसका राज्य कीचड़ में फँसी हुई गौ के समान दुःखित होता है।
जो राज्य बहुत-से शूद्रों तथा नास्तिकों (परलोक तथा ईश्वर को नही माननेवालों) से व्याप्त तथा ब्राह्मणों से रहित है, दुर्भिक्ष तथा व्याधियों से पीड़ित वह सम्पूर्ण राज्य ही नष्ट हो जाता है।
(धर्मकार्य देखने के लिए) धर्मासन पर बैठकर, शरीर को ढँककर, एकाग्रचित्त होकर तथा लोकपालों को प्रणाम कर सभासद कार्य अर्थात्‌ मुकदमे को आरम्भ करें।
(सभासद क्रमशः प्रजापालन तथा प्रजोच्छेदनरूप) अर्थ तथा अनर्थ और धर्म तथा अधर्म को जानकर सब कार्यॉर्थियों (मुद्दई-मुद्दालह) के कार्यो (मुकदमों) को वर्ण, (ब्राह्मण क्षत्रिय आदि) के क्रम से देखे।
(न्यायाधीश) बाहरी चिह्लों से, स्वर (बोलने के समय रुकना घबड़ाना, गद्दगद होना आदि) वर्ण (मुख का उदास या प्रसन्न होना आदि), इङ्गित (सामने नहीं देख सकना अर्थात्‌ नीचे की ओर से इधर, उधर देखना), आकार (कम्पन, स्वेद, रोमाञ्च आदि का होना) और चेष्टित (हाथों को मलना, अङ्गुलियों को चटकाना, अङ्गों को मरोड़ना आदि) से मनुष्यों (अर्थी, प्रत्यर्थी, साक्षी आदि) के भीतरी भावों को मालूम करे।
आकार, इङ्गित, गमन, चेष्टा, भाषण तथा नेत्र एवं मुख के विकारों से (मनुष्यों का) भीतरी भाव मालूम होता है।
राजा को नाबालिग या अनाथ के धन की तब तक रक्षा करनी चाहिये, जब तक उसका समावर्तन संस्कार (ब्रह्मचर्य की पूर्ति के बाद का तथा गृहस्थाश्रमों में प्रवेश के पहले का संस्कार विशेष) न हो जाय या उसकी अवस्था सोलह वर्ष की न हो जाय।
वन्ध्या, पुत्र या कुल (सपिण्ड) से हीन पतिव्रता विधवा और रोगिणी स्त्रियों की सम्पत्ति की रक्षा भी पूर्वोक्त वचन (८।२७) के अनुसार ही राजा को करनी चाहिये।
उन जीवित स्त्रियों (८-२८) का धन जो बान्धव आदि रक्षा करने के बहाने से या अन्य प्रकार से दबाकर ले, धर्मात्मा राजा चोर के समान दण्डित कर उनका शासन करे।
राजा अस्वामिक (लावारिस) धन को तीन वर्ष तक सुरक्षित रखे (“यह किसका धन है? कहाँ तथा किस प्रकार खो गया था?” इत्यादि घोषणाकर राजद्वार आदि सबके देखने योग्य स्थान पर रखे), तीन वर्ष के पहले उस धन का स्वामी (प्रमाण देकर) उस धन को ले जावे तथा तीन वर्ष के बाद राजा उस धन को अपने अधीन कर ले अर्थात्‌ अपने कोष में सम्मिलित कर ले।
(उस अस्वामिक अर्थात्‌ लावारिस धन को) जो कोई 'यह मेरा है' ऐसा कहे, उससे राजा विधिपूर्वक प्रश्न करे (धन का रंग, रूप, तौल या गिनती आदि प्रमाण, नष्ट होने का स्थान तथा समय पूछे) और उसके कहने के अनुसार धन का रंग संख्या, आदि प्रमाण ठीक-ठीक मिल जाय तब उस धन का वह मनुष्य अधिकारी होता है (अतएव राजा वह धन उस मनुष्य को दे दे)।
अस्वामिक (लावारिस) धन के नष्ट होने (भूलने) के स्थान, रंग रूप तथा प्रमाण को ठीक-ठीक नहीं बतलाने पर (उस धन को अपना कहनेवाले व्यक्ति से) जितना धन हो, उतना ही दण्ड ले (जुर्माना करे)।
अस्वामिक (लावारिस) धन को अपना बतलानेवाला व्यक्ति (उस धन के रंग रूप, नष्ट होने का स्थान, प्रमाण आदि ठीक-ठीक बतला दे, तब राजा उसं धन में पात्र के अनुसार षष्ठांश; दशमांश या द्रादशांश धन को धर्म का स्मरण करता हुआ) (ऐसे अस्वामिक धन में से इतना भाग लेना राजा का धर्म है” यह मानता हुआ) ग्रहण करे (तथा शेष धन उस व्यक्ति को देवे)।
यदि चोरी किये गये हुए धन को राजपुरुष (पुलिस आदि के) द्वारा प्राप्त कर लें तो राजा योग्य रक्षकों के द्वारा उस धन की रक्षा करावे तथा उस धन के चोर को हाथी से मरवा डाले।
स्वयं या राजपुरुष (पुलिस आदि) के द्वारा प्राप्त चोरी किये गये धन को जो मनुष्य सत्य-सत्य (उस धन का रङ्ग, रूप, संख्या या तौल आदि प्रमाण, भूलने का स्थान आदि ठीक-ठीक) बतला दे, (राजा पात्रानुसार) उस धन में से षष्ठांश या द्वादशांश लेकर शेष धन उस मनुष्य को वापस दे दे।
दूसरे के धन को अपना बतलानेवाले अपराधी को उसके धन का अष्टमांश या उसी धन (जिसे वह अपना बतलाता था) के बहुत थोड़े भाग से दण्डित करे अर्थात्‌ उससे जुर्माना वसूल करे।
विद्वान्‌ ब्राह्मण तो पूर्वस्थापित धन को देखकर सब धन ले ले (षष्ठांशभाग भी राजा को न दे) क्योंकि वह (विद्वान्‌ ब्राह्मण) सबका स्वामी है।
पृथिवी में गड़े हुए (अस्वाभाविक अर्थात्‌ लावारिश) प्राचीन जिस धन को राजा देखे अर्थात्‌ प्राप्त करें, उसमें से आधा ब्राह्मण को दे और आधा अपने खजाने में जमा करे।
पृथ्वी में गड़े हुए प्राचीन (ब्राह्मणों को छोड़कर दूसरे के धन का तथा धातुओं के खानों) का आधा भाग रक्षा करने से राजा लेवे; क्योंकि वह पृथ्वी का स्वामी है।
राजा को चोरों के द्वारा चुराया गया धन (उस चोरों से लेकर) सब वर्णो के लिए दे देना चाहिये। उस धन का उपयोग करता (अपने काम में लाता) हुआ राजा चोर के पाप को प्राप्त करता है।
धर्मज्ञ (राजा) जातिधर्म (ब्राह्मणादि के लिए यज्ञ करना-कराना आदि) देशधर्म (देशानुसार शाख्रानुकूल व्यवस्थित धर्म) श्रेणिधर्म (वनिया अर्थात्‌ व्यापारी आदि के लिए नियत धर्म-विशेष) और कुलधर्म (वंशपरम्परानुसार नियत धर्म) को देखकर तदनुसार उनके अपने-अपने धर्म की व्यवस्था करे।
(जाति-देश-कुल धर्मानुसार) अपने-अपने कार्यो को करते तथा अपनेअपने कार्य में स्थित होकर दूर रहते हुए (साक्षात्‌ नित्य-नैमित्तिक सम्बन्ध नहीं रहने पर) भी मनुष्य लोकप्रिय हो जाता है।
राजा या राजपुरुष स्वयं विवाद (झगड़े) को उत्पन्न (खड़ा-पैदा) न करे और दूसरे (अर्थी या प्रत्यर्थी अर्थात्‌ मुद्दई या मुद्दालह) के लाए हुए विवाद को किसी प्रकार (लोभ आदि के कारण) दबावे नहीं अर्थात्‌ उसकी उपेक्षा नहीं करके उसका न्याय करे।
जिस प्रकार शिकारी मृग के रक्तचाप (से चिह्नित मार्ग) से स्थान का निश्चय कर लेता है, उसी प्रकार राजा को अनुमान (८।२५-२६), या प्रत्यक्ष प्रमाण) से धर्म के तत्त्व का निर्णय करना चाहिए।
व्यवहार अर्थात्‌ मुकदमा देखने के लिए तैयार राजा सत्य से युक्त व्यवहार को, अपने को, (अन्याय करने से स्वर्गादि प्राप्ति नहीं होगी इत्यादि) साक्षियों (गवाह) को; देश, काल के अनुसार स्वरूप (छोटा या बड़ा इत्यादि) को देखे।
सज्जन (श्रेष्ठ विद्वान्‌) एवं धार्मिक ब्राह्मणों ने जिनका पालन किया हो, देश कुल (वंश) तथा जाति के अनुसार उस व्यवहार का निर्णय करे।
(यहाँ तक साधारण रूप से व्यवहार देखने की विधि कहकर आगे ऋण लेने पर व्यवहार देखने की विधि कहते हैं--) ऋण देने वाले अपना ऋण पाने के लिए राजा के यहाँ प्रार्थना की हो तो वह राजा (आगे कहे गये लेख, साक्षी आदि प्रमाणों से प्रमाणित) धन को ऋण लेने वालों से ऋण देनेवालों को दिलवाये।
जिन-जिन उपायों से (उक्त लेख साक्षी आदि उपायों से प्रमाणित) धन ऋण देनेवालों को मिल सके, उन-उन उपायों से ऋण लेनेवालों को वश में करके राजा उक्त प्रमाणित धन ऋण देनेवाले को दिलवाये।
धर्म, व्यवहार, छल, आचरण और पाँचवें बलात्कार के द्वारा ऋण लेने वाले व्यक्ति से धनी (ऋण देने वाले) का धन दिलवाये।
जो ऋण देनेवाला ऋण लेनेवाले में बल आदि के द्वारा अपना ऋण में दिया हुआ धन वसूल करता हो, उसे राजा मना न करे अर्थात्‌ अपना ऋण वसूल कर लेने दे।
यदि ऋण लेनेवाला ऋण को मुकर जाय अर्थात्‌ मैने ऋण नहीं लिया है। ऐसे मना कर दे तथा लेख और साक्षी के द्वारा उसका ऋण लेना प्रमाणित हो जाय तो राजा ऋण लेनेवाले से ऋण में लिया हुआ धन ऋणपूर्तिरूप में तथा ऋण का दशांश अतिरिक्त धन दण्डरूप में ऋण देनेवाले के लिए (१०।१३५ के अनुसार) दिलवावे।
न्यायालय में न्यायाधीश क “इस धनी (ऋण देनेवाला) का धन दो” ऐसा कहने पर ऋण देनेवाला यदि मुकर जाय (ऋण लेने का निषेध कर दे) तो अर्थी (मुद्दई अर्थात्‌ ऋण देनेवाला) साक्षी या अन्यान्य प्रमाण (लेख आदि) बतलावे।
यदि ऋणदाता ऐसे स्थान पर ऋण देना बतलावे जहाँ ऋण-ग्रहीता का उस समय रहना सर्वथा असम्भव हो, अथवा किसी स्थान को पहले कहकर बाद में उसे कहना स्वीकार न करे, बात को पूर्वापर विरुद्ध कहे (पहले कही हुई बात से बाद में कही हुई बात का मिलान नहीं हो, दोनों एक दूसरे के विरूद्ध पड़ती हों), पहले अपने हाथ से ऋण देना बतलाकर बाद में अपने पुत्र आदि के हाथ से ऋण देना कहने लगे,
तथा न्यायाधीश के 'क्यों तुमने रात में, एकान्त में या बिना किसी साक्षी के रहते या बिना कागज (स्टाम्प--हैंटनोट आदि) दिखवाये आदि के धन दिया, इत्यादि पूछने पर ऋणदाता सन्तोषजनक उत्तर न दे, जो ऋणदाता साक्षियों को एकान्त में ले जाकर बातचीत करे (साक्षी को सिखलावे),
जो पूर्वकथित विषय की दृढ़ता के लिए न्यायाधीश (या प्रतिपक्षी या उसके वकील आदि) से पूछे गये प्रश्नों (जिरहों) की चाहना न करे, जो कहे गये व्यवहारों को पहले नहीं कहकर इधर-उधर की बातें कहे, न्यायाधीश के “कहो?" ऐसा कहने पर भी जो नहीं कहे,
जो पूर्वकथित बातों का समर्थन प्रमाणों द्वारा नहीं करे, “कौन बात मुझे कहनी है?” यह (घबड़ाने के कारण) नहीं समझकर दूसरी (अपने प्रतिकूल एवं प्रतिपक्षी के अनुकूल) ही बात कहने लग जाय अर्थात्‌ घबड़ाने से आगे पीछे की बात या अपने कार्य को सिद्ध करनेवाली बात नहीं कहकर चाहे जो कुछ कहे, वह ऋणदाता ऋण का (धन का) अधिकारी नहीं होता है।
(जो ऋणदाता) “मेरे साक्षी हैं' ऐसा कहने पर न्यायाधीश के 'उन साक्षियों को यहाँ उपस्थि कर सके; न्यायासन पर स्थित वह न्यायाधीश उन कारणों से उस ऋणदाता के लिए ऋणग्रहीता से ऋण में लिये हुए धन को न दिलवावे।
जो वादी (अर्थी = मुद्दई पहले मुकदमा दायर कर) बाद में कुछ न कहे, वह धर्मानुसार (बड़े-छोटे मुकदमे के अनुसार) वध्य (फाँसी देने योग्य) या दण्ड्य (ताडन या अर्थदण्ड जुर्माना करने योग्य) है और यदि प्रत्यर्थी (मुद्दालह) तीन पक्ष में नहीं बोले अर्थात्‌ मुद्दद की बातों का सन्तोषजनक उत्तर न दे तो वह धर्मानुसार (कपटपूर्वक नहीं) पराजित होता है।
जो प्रत्यर्थी (मुद्दालह) जितने धन को छिपावे अर्थात्‌ अधिक धन लेकर भी जितना कम बतलावे तथा जो अर्थी (मुद्दई) जितने धन को असत्य बोले अर्थात्‌ कम धन देकर भी जितने अधिक धन का दावा करे अधर्म को जाननेवाला राजा (या राज नियुक्त न्यायाधीश) उसका दुगुने धन से उन्हें दण्डित करे।
धन चाहनेवाले (मुददई के मुकदमा करने पर मुद्दालह) धन लेना स्वीकार न करे तो राजाधिकारी ब्राह्मण (न्यायाधीश) के सामने वादी (मुद्दई) कम से कम तीन साक्षियों (गवाहों) से अपनी बात को प्रमाणित करे।
महर्षियों से भृगु मुनि कहते हें कि धन लेनेवालों (साहुकार = महाजन) को मुकदमों में जैसे साक्षी बनाने चाहिये, उन्हें कहता हुँ तथा जिन प्रकार उनको सत्य कहना चाहिये वह भी कहता हूँँ।
गृहस्थ, पुत्रवाले, पहले से वहाँ निवास करनेवाले, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जाति वाले ये लोग मुद्दई के साक्षी हो सकते हैं; आपत्तिकाल को छोड़करं (धनादि के लेन-देन में) चाहे जो काई साक्षी नहीं हो सकता है।
सब वर्णो में (ब्राह्मणों में भी) आप्तों (राग-द्रेष से रहित होकर निष्पक्ष बोलनेवालों) को, सब धर्मा के ज्ञाता, निर्लोभी-इन लोगों को सब वर्णो (ब्राह्मणों में भी) में साक्षी बनना चाहिये तथा इनके प्रतिकूल (राग-द्रेषपूर्वक पक्षपात से बोलनेवाले. धर्मज्ञानशून्य तथा लोभी) लोगों को (साक्षी बनाने में) छोड़ देना चाहिये।
ऋणादि के देने या लेने के सम्बन्ध वाले, मिश्र, सहायक (नौकर आदि), शत्रु (मुद्दालह का विरोधी), जिसने दूसरे किसी बात में झूठी गवाही दी हो वह, रोगपीड़ित तथा महापातक आदि से दूषित लोगों को साक्षी न बनावे।
राजा, कारीगर (पाचक; बढ़ई, लोहार आदि) नट-भाट आदि, वैदिक, ब्रह्मचारी तथा संन्यासी - इनको साक्षी न बनावे।
अत्यन्त अधीन (गर्भ-दास या क्रीत-दास आदि) लोक निन्दित, क्रूर कर्म करनेवाला, बूढ़ा, बालक, अकेला, चाण्डाल और विकलेन्द्रिय इनको साक्षी नहीं बनाना चाहिये।
(बान्धवादि के विनाशादि के कारण) दुःखी, मत्त, पागल, भूख-प्यास से पीड़ित, थका, कामी, क्रोधी और चोर-इनको साक्षी नहीं बनावे।
(स्त्रियो के (व्यवहार-मुकदमें में) स्त्रियों को, द्विजों के (व्यवहार में) सदृश द्विजों को, शूद्रों के (व्यवहार में) शूद्रों को तथा चाण्डालों के (व्यवहार में) चाण्डालों को साक्षी बनाना चाहिए।
घर के भीतर, वन आदि में चोर आदि के शरीर में चोट आने या मारे जाने पर, जो भी कोई मिल जाय, उसे ही वादी और प्रतिवादी (मुद्द और मुद्दालह)दोनों पक्ष का साक्षी बनाना चाहिये (किन्तु ऋण आदि के लेन-देने में जिस किसी को साक्षी नहीं बनाना चाहिये।
उक्त स्थानों (८।६९) में दूसरे साक्षी नहीं मिलने पर बालक, वृद्ध, शिष्य, बन्धु, दास और कर्मकर (नौकर) को साक्षी बनाना चाहिये।
गवाही में असत्य बोलनेवाले बालक, स्त्री, वृद्ध और अस्थिर चित्त वालों की बातें अस्थिर होती हैं (अतएव अस्थिर बात कहने पर न्यायाधीश उनकी गवाही को असत्य माने)।
साहस कार्य (घर या गल्ले आदि में आग लगाना आदि), चोरी, आचार्यस्री-संग्रहण, वचन तथा दण्ड की कठोरता--इनमें साक्षियों की परीक्षा (८।६२-६९ के अनुसार), नहीं करनी चाहिये (किन्तु ८।६९-७० के अनुसार स्त्री-बालक आदि साक्षियों को भी स्वीकृत कर लेना चाहिये)।
साक्षियों के परस्पर विरुद्ध वचन कहने पर राजा (या राजा द्वारा नियुक्त न्यायाधीश) बहुमत को तथा दोनों के समान होने पर श्रेष्ठ गुणवालों को और उन (गुणियों) में भी विरोध आने पर क्रियानिष्ठों को (गोविन्दराज के मत से ब्राह्मणों को) प्रमाणित माने।
देखने योग्य विषय में प्रत्यक्ष देखने तथा सुनने योग्य विषय में स्वयं सुनने से साक्षित्व (गवाही) ठीक होता है, उस विषय में सत्य कहनेवाला साक्षी धर्म, अर्थ से हीन नहीं होता है (अन्यथा असत्य कहनेवाला साक्षी धर्मच्युत तो होता ही है अर्थ दण्ड (जुर्माना आदि) होने से अर्थच्यूत भी होता है)।
यदि साक्षी देखे या सुने हुए विषय को न्यायालय में असत्य कहता है, तो वह अधोमुख (उल्टा होकर नीचे मुख किये) नरक में गिरता है तथा (अन्य पुण्य) कर्मो से प्राप्त होनेवाला स्वर्ग भी उसे नहीं मिलता है।
वादी या प्रतिवादी के द्वारा साक्षी नहीं बनाये जाने पर (“मेरा साक्षी बनो” ऐसा उनके नहीं कहने पर) भी वह जैसा देखे तथा सुने, न्यायाधीश के पूछने पर वैसा ही कहे।
निर्लोभ एक भी साक्षी ठीक होता है, स्री-बुद्धि के अस्थिर होने से आत्मशुद्धियुक्त भी बहुत-सी स्त्रिया ठीक साक्षी नहीं होतीं, तथा चोरी आदि के दोषों से युक्त साक्षी भी (चाहे वे पुरुष ही क्यों न हों) ठीक नहीं होते।
साक्षी (भय या दबाव आदि न होने पर) स्वभावत: जो कुछ कहे न्यायाधीश को उसे ही ठीक मानना चाहिये; अन्य किसी कारण (भय, दबाव, शील या सङ्कोच आदि) से धर्मविरुद्ध निष्प्रयोजन बातें वह कहे तो उसे ठीक नहीं मानना चाहिये।
वादी तथा प्रतिवादी (मुद्द तथा मुद्दालह) के सामने न्यायालय में उपस्थित साक्षियों से न्यायाधीश प्रियभाषण करता हुआ इस विधि से (८।८०-८६) प्रश्न करे।
तुम लोग इन दोनों (अर्थी-प्रत्यर्थियों) के व्यवहार (मुकदमे) में जो कुछ जानते हो, उन्हें सत्य-सत्य कहो, क्योंकि तुम लोगों की यहाँ गवाही है।
गवाही में सत्य कहनेवाला साक्षी मरने पर श्रेष्ठ लोकों (स्वर्ग आदि) को पाता है और इस लोक में श्रेष्ठ यश (नामवरी) पाता है, क्योंकि यह सत्य भाषण ब्रह्म से पूजित है।
गवाही में असत्य बोलता हुआ मनुष्य वरुण के पाश (सर्परूप रस्सी) से बाँधा जाता है तथा जलोदर रोग से परवश होकर सौ जन्म तक पीड़ित होता है; इस कारण गवाही में सत्य बोलना चाहिये।
गवाह सत्य से पवित्र होता (पाप से छुट जाता) है, सत्य से उसका धर्म बढ़ता है, इस कारण गवाहों को सब वर्णों के विषय में सत्य ही बोलना चाहिये।
आत्मा ही शुभ और अशुभ कर्मो का साक्षी (गवाह) है और आत्मा की गति भी आत्मा ही है, इस कारण मनुष्यों के श्रेष्ठ साक्षी आत्मा का (असत्य बोलकर) अपमान मत करो।
पापी पुरुष समझते हैं कि “हमको कोई नही देखता'; किन्तु उनको (अग्रिम शलोक में कहे जानेवाले) देवता देखते हें तब अपने ही अन्त:करणों में स्थित पुरुष देखता है।
आकाश, भूमि, जल, हृदय, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात्रि, दोनों सन्ध्याएँ (प्रात: सन्ध्या तथा सायं सन्ध्या) और धर्म - ये शरीरधारियों के व्यवहार (शुभाशुभ कर्म) को जानते हैं।
शुद्ध हृदय न्यायकर्त्ता देवता की प्रतिमा और ब्राह्मण के पास में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके खड़े हुए सत्यवक्ता द्विजों से (या अन्य जातीय साक्षियों से भी) पूर्वाह समय में (दोपहर के पहले) गवाही लेवे।
न्यायाधीश ब्राह्मणों से 'कहो', क्षत्रियों से “सत्य कहो”, वैश्यों से गौ, बीज और सोना चुराना पाप है । वह पाप तुम्हें असत्य गवाही देने पर लगेगा' तथा शूद्रो से 'तुम्हें सब पाप लगेंगे, यदि तुम असत्य गवाही दोगे? ऐसा (८।८९-१०१) कहकर गवाही लेवे।
ब्राह्मण, स्री तथा बालक की हत्या करनेवाले, मित्रद्रोही तथा कृतघ्न को जो नरक आदि लोक प्राप्त होते हैं, वे सब असत्य बोलते हुए तुम्हें प्राप्त होवें।
हे भद्र! यदि तुम अन्यथ अर्थात्‌ असत्य बोलो तो जन्म से लेकर जो कुछ तुमने पुण्य किया है, वह सब कुत्तों को प्राप्त हो अर्थात्‌ वह सब पुण्य नष्ट हो जाय।
हे कल्याणकारी चरित्र वाले! जो तुम “मैं अकेला हुँ", ऐसा आत्मा (जीवात्मा) को मानते हो (वैसा मत मानो, क्योंकि) पुण्य-पाप को देखेनेवाला सर्वश (परमात्मा) तुम्हारे हृदय में सर्वदा वर्तमान रहता है।
तुम्हारे हदय में रहनेवाला जो यह यम अर्थात्‌ दण्डकर्त्ता परमात्मा रहता है, उसके साथ यदि तुम्हारा विवाद नहीं है, तब तुम (असत्य-भाषणरूप पापकर्म के प्रायश्चित करने के लिए) गङ्गाजी और कुरुक्षेत्र मत जाओ अर्थात्‌ सत्य बोलने पर पाप नहीं लगने के कारण तुम्हें गङ्गाजी या कुरुक्षेत्र जाकर प्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं है।
गवाही में जो व्यक्ति असत्य बोलता है, वह अगले जन्म में नङ्गा, शिर मुड़ाया, अन्धा, भूख-प्यास से युक्त और कपाल (फूटा ठिकरा) लिये हुए भीख माँगने के लिए शत्रुओं के यहाँ जाता है।
धर्मनिर्णय (गवाही) में न्यायाधीश के सामने पूछने पर जो असत्य बोलता है, वह पापी अधोमुख होकर घोर अन्धकार वाले नरक को जाता है।
जो न्यायालय में जाकर बात को अस्तव्यस्त कर (गड़बड़ करके असत्य) बोलता है या बिना देखी हुई बात कहता है, वह मनुष्य काँटे सहित मछली को खानेवाले अन्धे के समान दु:खी होता है।
गवाही में बोलतु हुए जिस मनुष्य का सर्वज्ञ अन्यर्यामी (यह असत्य बोलता है या सत्य' ऐसी शङ्का नहीं करता, किन्तु यह सत्य ही बोलता है, ऐसा) निःशङ्क रहता है अर्थात्‌ गवाही देनेवाले मनुष्य के मन में कोई शङ्का नहीं होती; संसार में उससे अधिक श्रेष्ठ किसी दूसरे को देवता लोग नहीं मानते हैं।
हे सौम्य! गवाही में असत्य कहकर मनुष्य जितने बान्धवों को नरक में डालता है (या जितने बान्धवों की हत्या करने का फल पाता है), उनकी संख्या क्रमशः मुझसे सुनो।
पशु के विषय में असत्य बोलने पर पाँच, गौ के विषय में असत्य बोलने पर दश, घोड़े के विषय में असत्य बोलने पर सौ तथा मनुष्य के लिए असत्य बोलने पर सहस्र बान्धवो को नरक में डालता (या उनकी हत्या करने का फल पाता) है।
सुवर्ण के विषय में असत्य बोलता हुआ मनुष्य उत्पन्न (पिता, दादा आदि) तथा नहीं उत्पन्न हुए (पुत्र-पौत्र आदि) को नरक में डालता (या उनकी हत्या करने का फल पाता) है और पृथ्वी के विषय में असत्य बोलने पर सबसे नरक में डालता (या उनकी हत्या करने का फल पाता) है, इस कारण से भूमि के विषय में असत्य (कभी) मत बोलो।
पानी (तालाब, कुआँ, नहर आदि) स्री-भोग, मैथुन, कमल, रत्न और पत्थर को बनी सब प्रकार की वस्तुओं के विषय में असत्य बोलने पर भूमि के विषय में असत्य बोलने के समान पाप लगता है अर्थात्‌ वह मनुष्य सब बान्धवों को नरक में डालता (या उनकी हत्या करने के समान फल पाता) है।
(न्यायाधीश साक्षी (गवाह) से कहे कि) तुम असत्य बोलने पर इन (८।८०-१००) सब दोषों को देख (जान) कर जैसा देखा और जैसा सुना है, वैसा ही सब कहो।
गो-रक्षा, व्यापार, बढ़ई, लोहार या सूप-डाला आदि बनाने, नाचनेगाने, दास (सन्देश पहुँचाने) और निन्दित कर्म करने (या सूद लेने) की जीविका करनेवाले ब्राह्मणों से (साक्षी के विषय में प्रश्‍न करते समय राजा) शूद्र के समान वर्ताव करे।
बात को जानता हुआ धर्म (दया, जीवरक्षा आदि) के कारण आगे वक्ष्यमाण विषयों में अन्यथा कहनेवाला मनुष्य स्वर्गलोक से भ्रष्ट नहीं होता अर्थात्‌ धर्मबुद्धि से असत्य साक्षी देनेवाले का स्वर्ग नहीं बिगड़ता है। (मनु आदि महर्षिगण) उस वाणी को दैवी (देव-सम्बन्धिनी) वाणी कहते हैं।
जहाँ सत्य कहने पर शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय या ब्राह्मण को प्राणदण्ड (फाँसी) होवे; वहाँ असत्य कहना (गवाही देना) चाहिए, क्योंकि वह असत्य कहना सत्य कहने से श्रेष्ठ है।
उस असत्य का निवारण करते हुए वे (असत्य कहनेवाले साक्षी) चरुओं से वाणी है देवता जिसकी ऐसा सरस्वती का याग करें।
अथवा (उक्त असत्य कहनेवाला साक्षी उक्त दोष के निवारणार्थ) कूष्माण्ड (यद्देवा देवहेडनम्‌ यजु० २०।१४) मन्त्रों से, या वरुण देवता को (वरुण हैं देवता जिसका ऐसे) “उदुत्तमं वरुणपाशम्‌ (यजु०१२।२)' मन्त्र से अथवा जल है देवता जिसका ऐसे 'आपो हि ष्ठा मयो भुवः? (यजु० १२।५०) मंत्र से विधिपूर्वक (स्वगृह्ोक्त परिस्तरणादि के साथ) अग्नि में हवन करे।
यदि स्वच्छ रहता हुआ भी साक्षी तीन पक्ष (डेढ़ मास) तक ऋण के मुकदमे में साक्ष्य गवाही न दे तो ऋणी मनुष्य ऋणदाता (महाजन) को सब लिया हुआ धन देवे तथा राजा को दण्डस्वरूप उक्त ऋणद्रव्य का दसवाँ भाग देवे।
गवाही देनेवाले गवाह के यहाँ (गवाही देने के बाद) एक सप्ताह में रोग; आग लगना अथवा बान्धवों (पुत्रादि निकट सम्बन्धियों) का मरण हो जाय तो ऋणी महाजन को सब धन देवे तथा राजा को दण्ड स्वरूप (ऋणद्रव्य का दशांश धन) देवे।
बिना साक्षी वाले मुकदमों में परस्पर विवाद करते हुए वादी तथा प्रतिवादी (मुद्दई तथा मुद्दालह) से ठीक-ठीक सच्चाई नहीं मालूम पड़ने पर राजा (न्यायाधीश) शपथ करके सच्चाई को मालूम करे।
महर्षियों तथा देवों ने सन्दिग्ध कार्य के निर्णायक शपथ को बनाया (“इस वसिष्ठ मुनि ने सौ पुत्रों को भक्षण किया है” ऐसा विश्वामित्र के कहने पर वसिष्ठ ने अपने को निर्दोष बताने के लिए) पैजवन (पिजवन के पुत्र) “सुदास्‌' नामक राजा के यहाँ शपथ किया था।
विद्वान्‌ (समझदार) मनुष्य छोटे काम के लिए भी असत्य शपथ न करे; क्योंकि असत्य शपथ लेता हुआ मनुष्य परलोक में (मरकर नरक पाने से) तथा इस लोक में भी (अपयश बदनामी पाने से) नष्ट होता है।
कामिनी के विषय में (अनेक अपनी स्त्रियो के रहने पर "मैं तुमसे ही बहुत प्रेम करता हूँ दूसरी से नहीं" ऐसा शपथकर रति आदि करने के विषय में), विवाहों में (मैं दूसरी स्त्री के साथ विवाह नहीं करूंगा ऐसा, अथवा--कन्यादि के विवाह के विषय में अर्थात्‌ बहुत गुणवती एवं सुन्दरी है” इत्यादि कहकर कन्या के विवाह कराने में), गौओं के भूसा-घास आदि के विषय में, होम के लिए लकड़ी लेने के विषय में तथा ब्राह्मणरक्षार्थ स्वीकृत धनादि के विषय में असत्य शपथ करने में पाप नहीं होता है।
ब्राह्मण को सत्य की, क्षत्रिय को वाहन (हाथी, घोड़ा आदि) तथा शस्त्र की, वैश्यों को गौ, व्यापार तथा सुवर्ण आदि धन की और शूद्र को सब पापों की शपथ करावे।
अथवा (मुकदमें के बड़ा या छोटा होने की अपेक्षा) इस शूद्र से अग्नि लेकर सात कदम चलावे, जोंक आदि से रहित पानी में डूबावे अथवा इसके पुत्र तथा स्त्री के शिर का पृथक्‌-पृथक्‌ स्पर्श करावे।
(वैसा करने पर) जिस साक्षी करनेवाले को अग्नि (तपाया हुआ लौह) नहीं जलावे, पानी ऊपर को नहीं फेंके तथा शीघ्र वह दुःख नहीं पावे; उस साक्षी करनेवालों को शपथ में सच्चा समझना चाहिये।
पूर्वकाल में (सौतेले) छोटे भाई के द्वारा "तुम ब्राह्मण नहीं हो, शूद्र की संतान हो" ऐसा दूषित वत्स ऋषि के रोम को (भी संसार के शुभाशुभ जानने में) गुप्तचर रूप अग्नि ने सत्य के कारण से नहीं जलाया।
जिस-जिस विवाद (झगड़े-मुकदमे) में असत्य गवाही हो, (न्यायाधीश) उस-उस विवाद को फिर विचार करे और जिस विवाद में दण्ड-विधानादि (जुर्माने आदि का फैसला) हो चुका हो, वह समाप्त होकर भी नहीं समाप्त के समान है (अत: उस पर भी पुनर्विचार करे)।
लोभ, मोह (विपरीत ज्ञान अर्थात्‌ उल्टा समझना), भय, प्रेम, काम, क्रोध, अज्ञान तथा असावधानी (या लड़कपन) से साक्षी असत्य माना जाता है।
(भृगु मुनि ऋषियों से कहते हैं कि-) उक्त (८।११८) लोभादि में से किसी एक के कारण से (भी) जो असत्य गवाही दे, उसके दण्ड विशेष को हम क्रमश: कहते हैं-
लोभ से असत्य गवाही देने पर १००० पण, मोह से असत्य गवाही देने पर प्रथम साहस, भय से असत्य गवाही देने पर दो मध्यम साहस, मित्रता (प्रेम) से असत्य गवाही देने पर चौगुना अर्थात्‌ चार प्रथम साहस,
काम से असत्य गवाही देने पर दश गुना प्रथम साहस, क्रोध से असत्य गवाही देने पर तिगुना मध्यम साहस, अज्ञान से असत्य गवाही देने पर सौ पण और असावधानी से असत्य गवाही देने पर सौ पण का 'दण्ड' (जुर्माना, न्यायाधीश उस असत्य गवाही देनेवाले पर) करे।
(मनु आदि) विद्वानों ने धर्म के स्थापन तथा अधर्म के निवारण के लिए असत्य गवाहियों में इन (८।११०-१२१) दण्डों को बतलाया है।
धार्मिक राजा बार-बार असत्य गवाही देनेवाले तीन वर्णो (क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) को उक्त (८।१२०-१२१) प्रकार से दण्डित कर राज्य से निकाल दे और ब्राह्मण को केवल राज्य से निकाल दे अर्थात्‌ उसे दण्डित न करे।
ब्रह्मा के पुत्र मनु ने तीन वर्णो (क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) से विषय में दण्ड के दश स्थानों को (८।१२५) कहा है और ब्राह्मण तो पीडारहित अर्थात्‌ बिना किसी प्रकार दण्डित किये केवल राज्य से निकाल दिया जाता है।
उपस्थ (मूत्रमार्ग), पेट, जीभ, हाथ, पैर, नेत्र, नाक, कान, धन और देह (ये दण्ड के दश स्थान) हैं।
(न्यायाधीश या राजा) बार-बार किये गये अपराध, देश (ग्राम, वन आदि) काल (रात-दिन आदि), अपराधी की शारीरिक तथा आर्थिक शक्ति और अपराध के गौरव-लाघव का वास्तविक विचार कर दण्डनीय व्यक्ति को दण्डित करे।
धर्मविरुद्ध दिया गया दण्ड (राजा) के यश (जीवित अवस्था में प्रसिद्धि) तथा कीर्ति (मरने पर प्रसिद्धि) का नाश करनेवाला तथा परलोक में भी दूसरे धर्म से प्राप्त होनेवाले स्वर्ग का प्रतिबन्धक है; अतएव उसका त्याग करना चाहिए।
अदण्डनीय को दण्डित करता हुआ तथा दण्डनीय को छोड़ता हुआ राजा बड़ा अयश पाता है तथा नरक को भी जाता है।
राजा गुणियों को प्रथम बार अपराध करने पर वाग्दण्ड, उसके बाद (दूसरी बार अपराध करने पर) धिग्दण्ड, तीसरी बार आर्थिक दण्ड (जुर्माना) और इसके बाद वधदण्ड (अपराधानुसार शरीर ताडन अर्थात्‌ कोड़े बेंत से मारना या अंगच्छेद आदि या प्राण दण्ड) से दण्डित करे।
यदि (राजा या न्यायाधीश) वध (शरीरताडनच्छेदन आदि) से भी इसे (अपराधी को) वश में नहीं कर सके तो इन चारों (८।१२९) प्रकार के दण्डों से एक साथ उसे दण्डित करे।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि-) लोगों के व्यवहार के लिए ताँबे-चाँदी तथा सुवर्ण (सोने) की जो संज्ञयें (प्रमाण-विशेष) प्रसिद्ध हैं, उन सभी को मैं कहूँगा।
खिड़की आदि के छिद्र से सूर्य किरण के प्रवेश करते रहने पर जो सूक्ष्म धूलि (चमकता हुआ धूलिकण) दिखलायी पड़ती है, उसा (दिखलाई पड़नेवाले धूलि कण) को प्रमाणों के बीच में प्रथम प्रमाण "त्रसरेणु" कहते हैं।
आठ त्रसरेणु का एक लिक्षा, तीन लिक्षाओं का एक “राजसर्षप”, तीन राजसर्षपों का एक 'गौरसर्षप' जानना चाहिए।
छः गौर सर्षपों का एक "मध्ययव" (न अत्यन्त मोटा और न अत्यन्त महीन), तीन मध्ययवों का एक 'कृष्णल' (रत्ती), पाँच कृष्णलों (रत्तियो का एक “मासा') (मासा अर्थात्‌ एक आना भर) सोलह मासों (मासाओं = १६ आने भर) का एक सुवर्ण अर्थात्‌ एक रुपया भर = ८० रत्तीभर (जानना चाहिए)।
चार सुवर्णो (रुपये भर) का एक 'पल' (छटाँक), दश पलों का एक 'धरण' तथा दो कृष्णल (रत्तिओं) को काँटे (तराजू) पर रखने पर उसके बराबर एक 'रैप्यमाषक' जानना चाहिये।
उन सोलह रौप्य मापकों का एक 'रौप्यवरण' तथा “राजत” अर्थात्‌ चाँदी का 'पुराण' और ताँबे के कर्ष (पैसे) को 'कर्ष' तथा 'पण' कहते हैं।
दश रौप्य (चाँदी का) धरणों का एक राजत (चाँदी का) “शतमान” जानना चाहिये और प्रमाण से चार सुवर्णो का एक 'निष्क' (अशर्फी) जानना चाहिये।
ढाई सौ पणों का “प्रथम (पहला) साहस” कहा गया है, पाँच सौ पणों का “मध्यम साहस” तथा एक सहस्र पणों का एक “उत्तम साहस” जानना चाहिये।
(न्यायालय में ऋण लेनेवाले के) ऋण लेना स्वीकार कर लेने पर ऋण द्रव्य का पाँच प्रतिशत और असत्यता से ऋण लेना स्वीकार नहीं करने पर उसे दश प्रतिशत दण्डित करना चाहिये, ऐसा मनु भगवान्‌ का आदेश है।
(सूद (व्याज) पर त्रण देनेवाला महाजन) वसिष्ठ मुनि द्वारा प्रतिपादित धनवर्द्धक सूद ले व ऋणद्रव्य का १/८० भाग अर्थात्‌ सवा रुपया प्रतिशत मासिक सूद लेना चाहिए।
अथवा सज्जनों के धर्म को स्मरण करता हुआ ऋणदाता दो प्रतिशत अर्थात्‌ दो रुपये सैकड़ा प्रतिमास सूद ले, दो प्रतिशत सूद लेनेवाला ऋणदाता पापभागी नहीं होता।
अथवा वर्णो के अनुसार दो, तीन चार और पाँच प्रतिशत मासिक सूद ले अर्थात्‌ ब्राह्मण से दो रूपये सैकडा क्षत्रिय से तीन रुपये सैकड़ा, वैश्य से चार रुपये सैकड़ा और शूद्र से पाँच रुपये सैकड़ा सूद ले।
भूमि (घर या खेत) तथा गौर आदि रेहन (गिरवी) रखकर ऋण लेने पर उनका उपभोग करता हुआ ऋणदाता ऋणी (ऋण लेनेवाले) से सूद नहीं लेता तथा अधिक समय बीत जाने पर (मूलधन राशि के दुगुना हो जाने पर) भी ऋणदाता रेहन रखी हुई सम्पत्ति (भूमि गोधन, आदि) को न तो किसी दूसरे को देने का अधिकारी है और न बेचने का।
ऋणदाता बन्धक में रक्खी हुई वस्तु (वस्र, आभूषण आदि) का भोग न करे और यदि भोग करे तो वह ऋणी से उस वस्तु के ऋण का (८।१४०-१४२ में) कथित सूद न ले तथा यदि बन्धक रक्खी हुई वस्तु नष्ट-भ्रष्ट हो (टूट-फूट) जाय तो उसका मूल्य देकर ऋणी को सन्तुष्ट करे अन्यथा ऋण देनेवाले को बन्धक रक्खी हुई वस्तु की चोरी का पाप लगता है।
बन्धक रक्खी हुई या प्रेम से भोग के लिए अर्थात्‌ मंगनी दी हुई वस्तु समय अधिक बीत जाने पर भी समय बीतने के नियन्त्रण योग्य नहीं होती है, अतएव नियत समय बीत जाने पर भी उन वस्तुओं को देनेवाला जब मांगे तभी वे वस्तुएँ वापस कर देनी चाहिये।
प्रेम से उपभोग में लायी जाती हुई (दूध के लिए) गो, (सवारी करने या बोझ ढोने (लादने) के लिए) ऊंट तथा घोड़ा, हल आदि में जोतने योग्य बैल आदि पर से स्वामी का अधिकार कभी भी नष्ट नहीं होता अर्थात्‌ ग्रहण करनेवाले के उपभोग में आने पर भी उन पर मालिक का ही अधिकार रहता है।
अपनी सम्पत्ति को दूसरे के द्वारा अपने काम में लायी जाती हुई देखता हुआ भी स्वामी दश वर्षों तक कुछ नहीं कहता अर्थात्‌ नहीं रोकता तो वह स्वामी उस सम्पत्ति को पाने का अधिकारी नहीं है।
यदि किसी सम्पत्ति का स्वामी जड़ (पागल आदि) या सोलह वर्ष से कम आयु वाला (नाबालिग) न हो और उसके सामने अर्थात्‌ जानकारी में ही उसकी सम्पत्ति (भूमि आदि का) उपभोग दूसरा कोई व्यक्ति दश वर्ष से कर रहा हो, तब व्यवहार के अनुसार उस सम्पत्ति पर उसके स्वामी का अधिकार नष्ट हो जाता (नहीं रहता) है तथा भोग करनेवाला व्यक्ति उस सम्पत्ति को पाता है।
बन्धक, सीमा (सरहद), बच्चे (नाबालिग) का धन, धरोहर, किसी बक्स आदि में रःकर मुहरबन्द करके रक्षार्थ सौंपी गयी वस्तु, सत्री (दासी आदि), राजा तथा श्रोत्रिय का धन इनका दूसरे के भोग करने पर भी उनका स्वामित्व नष्ट नहीं होता अर्थात्‌ उसको पाने का अधिकार उनके स्वामी को ही रहता है।
बन्धक रक्खी हुई (वस्न, भूषण आदि) वस्तुओं का भोग जो नासमझ (व्यवहार ज्ञानशून्य) स्वामी की आज्ञा को नहीं पाकर करता हो, उसे उन वस्तुओं के भोग के बदले में आधा सूद लेना चाहिये।
मूल धन के एक साथ लिया गया सूद मूल धन के दुगुने से अधिक नहीं होता और अन्न, वृक्ष का फल, ऊन, भारवाहक जीव (बैल, ऊँट, गधा आदि बहुत दिनों के बाद भी) मूल के पंचगुने से अधिक नहीं होते।
पूर्वोक्त (८।१३९-१४२) प्रमाण से अधिक सूद नहीं लेना चाहिए तथा शूद्र से पाँच प्रतिशत लेने का जो प्रमाण है, उतना सूद द्विजों से लेना भी (मनु आदि महर्षि) निन्दित बतलाते हैं।
क्रणदाता ऋणी से पहले ही "प्रतिमास, प्रति दो मास, प्रति तीन मास तुम सूद दिया करना" ऐसा एक वर्ष तक का सूद चुकता कर देने का निर्णय करा ले, किन्तु एक वर्ष से अधिक समय का सूद एक बार में लेने का नियम कभी भी न करे और शास्त्र में (८।१३१-१४२) कहे हुए प्रमाण से अधिक सूद भी कभी नहीं ले; चक्रवृद्धि कालवृद्धि, कारित तथा कायिक सूद भी न ले।
निर्धारित समय पर ऋण चुकाने में असमर्थ ऋणी यदि फिर (हैण्डनोट आदि लिखना) चाहे तो वह वास्तविक सूद देकर हैण्डनोट आदि को बदल दे (नया लिख दे)।
यदि ऋणी सूद देने में असमर्थ हो तो सूद को मूल धन में जोड़कर जो धनराशि हो उतने का कागज (हैण्डनोट आदि) लिख दे, ऐसा करने पर उस धन (सूद सहित मूल धन) का सूद भी ऋणी को (ऋणदाता के लिए) देना होगा।
देश तथा काल की वृद्धि (भाड़ा-अमुक स्थान तक यह बोझ पहुँचाने का अथवा अमुक समय तक काम करने का इतना धन लूँगा इस प्रकार) निश्चय करने के बाद में देश या समय का उल्लंघन करे (उस नियत स्थान तक बोझ नहीं पहुँचावे या उतने समय तक कार्य नहीं करे) तब वह उसका भाड़ा पाने का अधिकारी नहीं होता है।
जलमार्ग तथा स्थलमार्ग के जानकर तथा इतने स्थान या इतने समय में इस विक्रेय वस्तु (सौदे) को पहुँचाने से इतना लाभ होगा इसको यथावत्‌ समझनेवाले व्यापारी आदि उस नियत स्थान तक पहुँचाने या उतने समय तक काम करने से जो वृद्धि (भाड़ा) निश्चित कर दे, उस स्थान तक वस्तु आदि पहुँचाने या उतने समय तक काम करने की वही वृद्धि (भाड़ा) प्रमाणित मानी जाती है।
जो व्यक्ति ऋण लेने में ऋणी का प्रतिभू (जमानतदार) रहे; वह यदि (समय पर) उस ऋणी को उपस्थित नहीं करे तो अपनी सम्पत्ति से उस ऋण को चुकता करे।
प्रतिभू (जमानतदार) होने से दिया जानेवाला, हँसी-मजाक आदि में भंड आदि को देने के लिए कहा गया, जुआ खेलने में हारा या लिया गया, मद्यपान में लिया गया, राजदण्ड (जुर्माने) का और नाव गाड़ी आदि के भाड़े का बाकी धन उसके पुत्र को नहीं देना पड़ता है।
उक्त विधान (जमानतदार होने के कारण दिया जानेवाला ऋणदाता का धन जमानतदार के पुत्र को नहीं देना पड़ता) ऋणी को धनी के पास उपस्थित करने मात्र के लिए (जमानतदार) होने की अवस्था के लिए है; किन्तु यदि पिता यह कहकर प्रतिभू बना हो कि (यह ऋणी ऋण चुकता नहीं करेंगा तो इससे चुकता करवा दूँगा या में चुकता कर दूँगा) ऐसी अवस्था में ऋणी के द्वारा धनी (ऋणदाता) का ऋण नहीं देने पर पिता के मरने पर भी वह ऋण उस (प्रतिभू) के पुत्र को देना पड़ता है।
अदाता (जो ऋण देने की जमानत नहीं लिया हो; किन्तु केवल ऋणी को ऋणदाता के सामने नियत समय पर उपस्थित करने की ही जमानत लिया हो तथा यह प्रतिभू की प्रतिज्ञा (शर्त) ऋणदाता को मालूम हो उस प्रतिभू के मरने पर (ऋणदाता) किस कारण (उसके पुत्र आदि से) ऋण लेने की इच्छा करेगा? अर्थात्‌ नहीं करेगा (ऐसे जमानतदार पिता के मरने पर उसके पुत्र को वह ऋण देना नहीं पड़ता)।
पूर्व (८।१६१) श्लोकोक्त प्रतिभू को यदि ऋणी ने ऋण का धन दे दिया है तथा ऋणदाता ने धन वापस देने को नहीं कहा है, ऐसी अवस्था में यदि वह प्रतिभू मर जाय और और उसका पुत्र उस ऋण के धन को अपनी सम्पत्ति में से चुकाने में समर्थ हो तो वह ऋणी के ऋण को चुकता कर दे, ऐसी शास्त्र मर्यादा है।
मत्त (मदिरा आदि के नशे से मतवाला), उन्मत्त (पागल), रोगी, सेवक, बालक (१६ वर्ष से कम आयु वाला अर्थात्‌ नाबालिग), और बूढ़ा-इनको पिता-भाई आदि सम्बन्धियो की सम्मति के बिना दिया गया ऋण व्यवहार (शास्त्र मर्यादा) के प्रतिकूल होता है।
"मैं ऐसा करूंगा" इस प्रकार की बात लेख आदि के द्वारा निर्णीत करने पर भी यदि धर्म (शास्रमर्यादा), कुल परम्परा और व्यवहार से प्रतिकूल कही गयी हो तो वह सत्य (प्रामाणिक) नहीं होती।
जो वस्तु कपट से बन्धक रक्खी गयी हो, बेची गयी हो; दी गयी हो या दान ली गयी हो; अथवा जहाँ पर कपट व्यवहार देखा गया हो वह सब नहीं किये के बराबर हो जाता है अर्थात्‌ अमान्य होता है।
ऋणी यदि मर जाय तथा उसने ऋणद्रव्य को अलग हुए या सम्मिलित परिवार के लिए व्यय किया हो तो वह ऋण उस मृत ऋणी के अलग हुए या सम्मिलित परिवार वालों को चुकाना चाहिये।
स्वामी (घर के मालिक) के देश या विदेश में रहने पर अधीन स्वरूप सेवक आदि ने भी कुटुम्ब के पालन-पोषणादि के लिए जो ऋण लिया हो, उसे स्वामी चुकता कर दे।
बलात्कार से जो (नहीं देने योग्य वस्तु) दिया गया हो, जो (भूमि, भूषण आदि) भोगा गया हो, अथवा (ऋण लेने या चक्रवृद्धि आदि सम्बन्धी) लेख (हैंडनोट, दस्तावेज आदि) लिखवाया गया हो; बलात्कार से कराये गये उन सब कार्यों को मनु ने नहीं किया गया अर्थात्‌ अमान्य बतलाया है।
(धर्म, अर्थ तथा व्यवहार अर्थात्‌ मुकदमे देखने वाले क्रमशः) गवाह, जमानतदार तथा कुल अर्थात्‌ स्वजन दूसरों के लिए क्लेश पाते हैं और (दान लेने, ऋण देने, विक्रय करने और व्यवहार देखने से क्रमशः) ब्राह्मण, ऋणदाता (महाजन), व्यापारी और राजा - ये चारों धन की वृद्धि करते हैं।
धनादि से क्षीण भी राजा को अग्राह्य धन नहीं लेना चाहिए तथा समृद्धिमान्‌ होते हुए भी (राजा को) ग्राह्य थोड़ा भी धन नहीं छोड़ना चाहिये।
अग्राह्य धनं के लेने तथा ग्राह्य धन के छोड़ने से (नागरिकों में प्रजाओं में) राजा को असमर्थ समझा जाता है तथा वह राजा अधर्म के कारण से मरकर तथा अपयश के कारण से यहाँ पर अर्थात्‌ जीता हुआ नष्ट होता है।
(शास्रीय वचनानुसार) (ग्राह्य धन को लेने तथा सजातियों के साथ विवाहादि) सम्बन्ध से और दुर्बलों की रक्षा से राजा की शक्ति बढ़ती है और वह मरकर (स्वर्गादि लाभ से) तथा यहाँ पर अर्थात्‌ जीते हुए (ख्याति आदि से) समृद्धिमान्‌ होता है।
इसलिए राजा क्रोध तथा इन्द्रियों को वश में करके और अपने प्रिय तथा अप्रिय का त्यागकर यमराज के समान सर्वत्र समव्यवहार रखते हुए वर्ताव करे।
जो राजा लोभादि के कारण अधर्म कार्यों को करता है, उस दुरात्मा राजा को शत्रु लोग शीघ्र वश में कर लेते हैं।
जो राजा काम और क्रोध को छोड़कर धर्मपूर्वक कार्या (व्यवहारों मुकदमों) को देखता है; प्रजा उस राजा का अनुगमन इस प्रकार करती है, जिस प्रकार नदियाँ समुद्र का।
"मैं राजा का प्रियपात्र हूँ" इत्यादि अभिमान से धन वसूल करते हुए ऋणदाता को जो ऋणी निवेदन (शिकायत) करे राजा उसे ऋण धन के चतुर्थांश धन से दण्डित करे तथा उसका वह धन भी दिलवा दे।
यदि ऋणी ऋण को देने में असमर्थ हो तथा ऋणदाता की जाति वाला या उसंसे छोटी जाति वाला हो तो वह ऋणी उस ऋणदाता के यहाँ (अपनी जाति के अनुरूप) काम करके ऋण को बराबर (चुकता) करे तथा यदि ऋणी ऋणदाता से बड़ी जातिवाला हो तो ऋणी को धीरे-धीरे (किस्तों में) चुकता करे।
इस प्रकार आपस में विवाद करते हुए मनुष्यों (वादियों तथा प्रतिवादियों) के साक्षियों तथा लेख आदि से निर्णीत कार्य को पूरा करे।
कुलीन, सदाचारी, धर्मज्ञाता, सत्यवादी, बहुत परिवार वाले, धनी और सज्जन के पास विद्वान्‌ मनुष्य धरोहर रक्खे।
जो मनुष्य जिस प्रकार (मुहर बन्द या बिना मुहर बन्द, गवाह के सामने या एकान्त में इत्यादि) से जिसके हाथ में जो धन (धरोहर के रूप में) रक्खे, उस धन को उसी प्रकार (मुहरबन्द या बिना मुहरबन्द, गवाह के सामने या एकान्त में) उसी लेनेवाले के हाथ से वह (धरोहर रखनेवाला) वापस ले; क्योंकि जिस रूप में दिया जाता है, उसी रूप में लेना न्यायसङ्गत है।
यदि धरोहर लेनेवाले से धरोहर देनेवाला स्वामी अपना धरोहर वापस माँगे य वह वापस नहीं दे तो न्यायाधीश धरोहर देनेवाले स्वामी से परोक्ष में धरोहर रखनेवाले से (इस वक्ष्यमाण (८1१८१) प्रकार से) धरोहर वापस मांगे।
दिये गये धरोहर के साक्षी नहीं होने पर न्यायाधीश वय (बचपन को छोड़कर युवा वृद्ध आदि) तथा रूप (सौन्दर्यं आदि) से युक्त गुप्तचरों से चोरी होने या राजा के छीन लेने आदि उपद्रवों का बहाना कराकर वास्तविक सुवर्ण या रुपया आदि को उसी धरोहर लेनेवाले के यहाँ धरोहर के रूप में रखवा दे तथा उस धरोहर लेनेवाले से उस धरोहर को माँगे अर्थात्‌ उन गुप्तचरों से माँगने को कहे।
फिर यदि धरोहर लेनेवाला वह व्यक्ति ज्यों का त्यों उसे वापस कर दे तो न्यायाधीश समझे कि पहले धरोहर वापस नहीं देने की शिकायत करनेवाले व्यक्ति ने उसके यहाँ धरोहर नहीं रक्खा था।
और यदि उन गुप्तचरों के दिये हुए सुवर्णादि धरोहर को लेनेवाला व्यक्ति ज्यों का त्यों वापस नहीं दे तो न्यायाधीश ताडन आदि दण्ड से उसे (धरोहर लेनेवाले व्यक्ति को) वश में करके धरोहर के उन दोनों धनों को दिलवावे, यह धर्म का निर्णय है।
निक्षेप तथा उपनिधि पिता के जीवित रहने पर उसके पुत्र या अन्य उत्तराधिकारी को नहीं देना चाहिये; क्योंकि उसके देनेवाले के मर जाने पर वे (निक्षेप तथा उपनिधि) नष्ट हो जाते हें और जीवित रहने पर कभी नष्ट नहीं होते (इस कारण अनर्थ होने के भय से वैसा न करे)।
धरोहर देनेवाले के मर मर जाने पर यदि उसके पुत्र या उत्तराधिकारी के लिए उस धरोहर को लेनेवाला स्वयं वापस लौटा दे तो राजा या धरोहर देनेवाले स्वामी के उत्तराधिकारी बान्धवादि या पुत्र को धरोहर वापस करनेवाले उस व्यक्ति पर अन्य द्रव्य के बाकी रह जाने का आक्षेप नहीं करना चाहिये।
(उस धरोहर वापस लौटानेवाले पर और धरोहर बाकी रह जाने का संदेह होने पर उस धरोहर देनेवाले व्यक्ति का बान्धवादि उत्तराधिकारी) निष्कपट होकर प्रेमपूर्वक ही उस शेष बचे हुए धरोहर का निश्चय करे तथा उसके व्यवहार को विचार कर अर्थात्‌ "यह धर्मात्मा है" ऐसा मानकर साम के प्रयोग से ही निर्णय करे।
सब प्रकार के धरोहरों के देने को अस्वीकार करने पर उसका निर्णय करने के लिए उक्त विधान (“साक्ष्यभावे-') (८।१८२) आदि कहा गया है। यदि मुहरबन्द धरोहर लेनेवाला ज्यों ता त्यों (ठीक-ठीक मुहरबन्द) धरोहर को वापस कर दे तथा उसे खोलने पर उसमें से कुछ नहीं ले तो धरोहर देनेवाले स्वामी को कुछ नहीं मिलता हैं।
धरोहर रकखे हुए द्रव्य में-से धरोहर को लेनेवाला स्वयं कुछ नहीं ले और वह धरोहर का द्रव्य चोरी हो जाय, पानी की बाढ़ में वह जाय या आग लगने से जल जाय, तो धरोहर लेनेवाले से धरोहर देनेवाला कुछ नहीं पाता है।
धरोहर का अपहरण करनेवाले (लेकर वापस नहीं देनेवाले) और बिना धरोहर दिये ही माँगनेवाले व्यक्तियों का निर्णय सामादि उपायों तथा वेदोक्त शपथों के द्वारा न्यायाधीश को करना चाहिये।
जो दिये हुए धरोहरों को वापस नहीं करता तथा जो धरोहर को बिना दिये ही माँगता है; उन दोनों को न्यायाधीश (सोना, मोती और मणि जवाहरात) आदि उत्तम द्रव्य का विषय होने पर) चोर के समान दण्डित करे तथा (ताँबा आदि सामान्य द्रव्य का विषय होने पर) उसके बराबर अर्थदण्ड से दण्डित करे अर्थात्‌ उतना रुपया जुर्माना करे।
राजा (या न्यायाधीश) निक्षेप का हरण करने (वापस नहीं देने) वाले मनुष्य से उतना ही धन दिलवा दे तथा उपनिधि को हरण करनेवाले मनुष्यों को भी वही (उतना ही) दण्ड दे अर्थात्‌ धरोहर के बराबर धन दिलवा दे।
जो मनुष्य कपट से (“तुम पर राजा क्रुध हैं, इतना धन मुझे दोगे तो मैं तुम्हारी रक्षा कर दूँगा' इस प्रकार कहकर या धनादि का लोभ देकर) दूसरे का धन हरण करे, उसे इस काम में सहायता देनेवालों के साथ सब लोगों के सामने राजा अनेक प्रकार के वधों (हाथ-पैर काटने, बाँधने या कोड़े या बेतों से मारने) से मारे।
साक्षी के सामने जिसने जितना धरोहर रक्खा है, (उस विषय के परिणाम के विषय में विवाद उपस्थित होने पर साक्षी जितना कहे) उतना ही वह धरोहर समझना चाहिये और उसके विरुद्ध कहनेवाला दण्ड के योग्य है।
जिसने जिस प्रकार एकान्त में धरोहर दिया हे और जिसने एकान्त में ही लिया है, उसे एकान्त में ही लेना तथा वापस करना चाहिये; क्योंकि जिस प्रकार दिया जाता है, उसी प्रकार वापस किया जाता है।
राजा (या न्यायाधीश मुहरबन्द या बिना मुहरबन्द दिये गये धरोहर का अथवा भोगार्थ प्रेमपूर्वक दी गयी (धन, वस्र आभूषणादि) महंगी वस्तुओं का निर्णय, लेनेवाले को यथासम्भव अपीडित करता हुआ करे।
जो मनुष्य (किसी वस्तु का स्वामी नहीं होता हुआ भी उस वस्तु के) स्वामी की आज्ञा लिये बिना ही दूसरे की कोई वस्तु बेच दे और (इस प्रकार) चोर होता हुआ भी वह अपने को चोर नहीं माने तो राजा उसके साक्षी को प्रमाणित नहीं माने।
यदि दूसरे की वस्तु उक्त प्रकार (८।१९३) से बेचनेवाला (उस बेची गयी वस्तु के स्वामी के) वंश का (पुत्र आदि सम्बन्धी) हो तो उसे राजा ६०० पण दण्ड (जुर्माना) करे और उस बेची गयी वस्तु के स्वामी के वंश का नहीं हो और उस वस्तु के स्वामी या उसके पुत्र आदि से वह (बेची गयी) वस्तु दान में या बेचने से नहीं मिली हो तो उस वस्तु को बेचनेवाला वह मनुष्य चोर के पाप को प्राप्त करता है अर्थात्‌ राजा को उसे चोर के समान दण्डित करना चाहिये।
स्वामी नहीं होने पर भी जो किया जाय, दिया जाय या बेचा जाय; उसे किया हुआ, दिया हुआ या बेचा हुआ नहीं मानना चाहिये; क्योंकि व्यवहार में जैसी मर्यादा है, वैसा नहीं किया गया है।
जिस किसी वस्तु का उपभोग देखा गया हो और उसके मिलने का साधन नहीं देखा जाय अर्थात्‌ यह वस्तु इस मनुष्य के यहाँ खरीदने से आयी या दानादि से ऐसा कोई प्रमाणीभूत साधन नहीं देखा जाय तो उस वस्तु के आने के कारण को ही मुख्य मानना चाहिये, उपभोग को नहीं, ऐसी शास्त्रमर्यादा है।
जो कोई वस्तु विक्रय (बेचने के) स्थान (बाजार या दुकान आदि) से बेचनेवालो अर्थात्‌ अनेक व्यापारियों के प्रत्यक्ष में खरीदी जाती है, उस दोष-रहित धन को न्यायपूर्वक खरीदनेवाला बेचनेवाले से प्राप्त करता है अर्थात्‌ वस्तु का स्वामी नहीं होने पर सर्वप्रत्यक्ष बेची गयी उस वस्तु का मूल्य खरीददार को बेचनेवाले से प्राप्तव्य होता है।
स्वामी नहीं होने पर किसी वस्तु को बेचनेवाले से निश्चित रूप से सर्व प्रत्यक्ष (बाजार में) खरीदनेवाला यदि उस बेचनेवाले को परदेश चले जाने या मर जाने आदि के कारण नहीं ला सके तो खरीदनेवाले अदण्डनीय उस व्यक्ति को राजा छोड़ दे (दण्डित न करे); किन्तु बेचे हुए उस वस्तु को खरीदनेवाले से उस वस्तु का स्वामी प्राप्त करता है।
अधिक मूल्यवाली वस्तु में थोड़े मूल्यवाली वस्तु (यथा कुङ्कम में कुसुम्म, घी में वनस्पति, इत्यादि) को मिलाकर साधारण वस्तु को अत्युत्तम बतलाकर तौल में कम और दूर या अन्धकार आदि के कारण जिसका वास्तविक रूप नहीं मालूम पड़ता ऐसी वस्तुएँ नहीं बेची जा सकती।
दूसरी सुन्दरी या विदुषी कन्या को दिखाकर बाद में यदि उससे भिन्न दूसरी कन्या के साथ (विवाह कराकर उसे) विवाद करनेवाले (पति) के लिए दी जाय तो वह (विवाह करनेवाला) पति उसी मूल्य में उन दोनों कन्याओं से विवाह करे - ऐसा मनु ने कहा है।
पगली, कुष्ठ रोग वाली और क्षतयोनि (विवाह से पहले मैथुन की हुई) कन्या के दोषों को पहले बतलाकर कन्यादान करनेवाला दण्डभागी नहीं होता।
यज्ञ में यदि वरण किया हुआ ऋत्विक्‌ (रोगादि के कारण) अपना काम नहीं करावे तो उसके किये गये काम के अनुसार बाकी काम को पूरा करनेवालों को उसका भाग देना चाहिये।
(माध्यन्दिन यज्ञादि में) सब दक्षिणा लेकर अपने काम को (रोगादि के कारण-शठतादि दुर्भावना के कारण नहीं) छोड़ता हुआ ऋत्विक्‌ सब दक्षिणा का भागी होता है (इस अवस्था में यज्ञकर्ता को) बाकी कार्य दूसरों से करवाना तथा अलग दूसरी दक्षिणा उसको देनी चाहिये।
आधानादि जिन कर्मो में प्रत्येक अङ्ग की जो दक्षिण बतलायी गयी है, उनको वही (उस अङ्ग का कार्य करानेवाला ही) ऋत्विक्‌ ले अथवा उन सब अङ्गों की दक्षिणाओं को विभक्तकर सब ऋत्विक्‌ परस्पर में बाँट लें।
किन्हीं शाखावालों के आधान में अध्वर्यु रथ को, ब्रह्मा तेज घोड़े को, होता घोड़े को तथा उद्गाता सोमलता को खरीदने पर उसे वहन करने (ढोने या लाने) वाली गाड़ी को प्राप्त करता है।
सब क्रत्विजो में प्रथम मुख्य चार ऋत्विज सब दक्षिणा का आधा भाग द्वितीय चार ऋत्विज्‌ उन प्रथम चार ऋत्विजों से अर्धांश, तृतीय चार ऋत्विज्‌ तृतीयांश और चतुर्थ चार ऋत्विज्‌ चतुर्थांश दक्षिणा प्राप्त करते हैं।
मिलकर काम करने वाले मनुष्यों (कारीगरों आदि) को इसी विधि (पूर्वोक्त यज्ञ-दक्षिणा भाग के अनुसार) (विज्ञान, व्यापार, कला आदि की कुशलता का ध्यान रखते हुए) हिस्से का बटवारा कर देना चाहिये।
धर्मार्थ (यज्ञादि कार्य के लिए) माँगनेवाले किसी को धन दे दिया गया हो (अथवा देने का वचन दिया गया हो) और वह धन धर्मकार्य में नहीं लगाया जाय तो दाता उस दिये गये धन को वापस ले लेवे (अथवा देने का वचन दिया हो तो मत देवे)।
यदि धर्मार्थ कहकर लिया हुआ धन वह (याचक धर्मकार्य में नहीं लगाते हुए भी) दाता को मांगने पर मद या लोभ के कारण वापस नहीं लोटावे (अर्थात्‌ स्वीकृत | धन को दाता से बलपूर्वक ग्रहण करे) तो राजा उसे चोरी के पाप की निवृत्ति (दूर करने) के लिए उसे (उक्त धन नहीं लौटानेवाले को) एक सुवर्ण (८।१३४) से दण्डित करे (और दाता को उक्त धन दिलवा ही दे)।
(महर्षि भृगुजी ऋषिओं से कहते हैं कि-) दिये गये धन को नहीं लौटाने पर यह धर्मयुक्त विधान कहा, इसके बाद वेतन नहीं देने पर विधान को मैं कहूँगा।
तन पानेवाला जो कर्मचारी स्वस्थ रहता हुआ भी कहने के अनुसार काम नहीं करे तो राजा उसे आट कृष्णल (सतती) सुवर्ण आदि से दण्डित कर और उसका वेतन नहीं दिलवावे।
वेतन पाने वाले जो कर्मचारी रोगी रहता हुआ काम नहीं करे तथा पुन: स्वस्थ होकर कहने के अनुसार करने लगे तो वह बहुत समय के बादर भी आरम्भ से वेतन पाता है।
जो कर्मचारी कहे हुए काम को स्वयं रोगी होकर दूसरे से नहीं करावे तथा स्वस्थ होकर स्वयं भी नहीं करे तो वह कुछ किये गये काम का भी वेतन नहीं पाता है।
महर्षि भृगुजी ऋषियों से कहते हैं कि वेतन लेकर काम करने वालों का यह (८।२१५-२१७) सम्पूर्ण धर्म मैंने कहा, अब आगे समय भङ्ग करने (शर्त तोड़ने) वालों का धर्म (दण्डादि की व्यवस्था) कहता हूँ।
ग्रामवासी, देशवासी या व्यापारी आदि के समुदाय (कम्पनी आदि) का जो व्यक्ति सत्यादि के शपथपूर्वक किये गये समय ('यह काम मैं इतने दिनों में पूरा करूँगा' इत्यादि रूप में शर्त-ठेका) को लोभ आदि के कारण भंग करे; उसे देश से निकाल दे।
अथवा उक्त समय भंग करने (शर्त तोड़ने) वाले को राजा निग्रहकर उससे चार 'सुवर्ण' (८।१३४) 'छ: निष्क' (८।१३७) या 'शतमान' (८।१३७) अर्थात्‌ ३२० रत्ती चाँदी का दण्ड (जुर्माना) दिलावे।
(महर्षि भृगुजी ऋषियों से कहते हैं कि-) धर्मात्मा राजा आम या जाति समूह में समय भंग करने (शर्त तोड़ने) वालों के लिए यह (८।२१९-२२०) दण्ड विधान करे।
कोई वस्तु (शीघ्र नष्ट होनेवाली अचल सम्पत्ति या बहुत समय बाद नष्ट होनेवाली भूमि, घर, बगीचा आदि अचल सम्पत्ति) खरीदकर या बेचकर जिसको पश्चात्ताप होने लगे तो वह दश दिन के भीतर (यदि सामान खरीदा हो तो) वापस कर दे तथा (यदि बेचा हो तो) वापस ले ले।
दश दिन के बाद तो (खरीदी हुई वस्तु को) नहीं वापस दे और बेची (हुई वस्तु को राजा) नहीं वापस दिलवावे। (बेची हुई वस्तु को) बलात्कार से लेता हुआ और खरीदी हुई वस्तु को) देता हुआ ६० पण (८।१३६) से राजा द्वारा दण्डनीय होता है।
जो दोषयुक्त कन्या के दोष को नहीं कहकर उस कन्या का दान कर दे अर्थात्‌ उसके साथ विवाह करा दे, राजा उसको स्वयं ९६ पण (८।१३६) दण्डित करे।
जो मनुष्य द्वेष से कन्या को 'यह कन्या नहीं है' अर्थात्‌ क्षतयोनि हो गयी है ऐसा कहे, (और पूछने पर) वह उस कन्या का दोष नहीं प्रमाणित करे तब उसको राजा सौ पण (८।१३६) से दण्डित करे।
विवाह-सम्बन्धी मन्त्र कन्याओं के ही विषय में नियत हैं, अकन्याओं के (क्षतयोनि होने से दूषित कन्याओं) के विषय में कहीं (किसी शास्त्रों में) भी नहीं, क्योंकि वे (दूषित कन्याएँ) धर्म कार्य से हीन हैं।
विवाह-सम्बन्धी मन्त्र भार्यात्व (सहधर्मिणपन) में निश्चित रूप से कारण हैं, उन (विवाह सम्बन्धी मन्त्रों) की सिद्धि विद्वानों को सप्तपदी होने पर जाननी चाहिये।
जिस-जिस कार्य को करने के बाद मनुष्य को पश्चाताप हो, उस-उस कार्य में इसी प्रकार (दश दिनों के भीतर - ८।२२२) धर्म युक्त मार्ग में राजा उसे स्थापित करे।
(भृगु मुनि ऋषियों से कहते हें कि-) अब मैं पशुओं के मालिकों तथा रक्षकों (रखवाली करनेवालों या चरवाहों) में मतभेद होने पर धर्म-तत्व के अनुसार यथोचित व्यवहार (मतभेद दूर करने के मार्ग) को कहूँगा।
स्वामी द्वारा (रखवालों को सौंपे गये पशुओं के योगक्षेम की निन्दा दिन में रखवालों की तथा रखवालों द्वारा स्वामी को घर में सौंपे गये पशुओं के योगक्षेम की निन्दा रात में स्वामी की होती है, अन्यथा (स्वामी के घर में पशु रखवालों द्वारा नहीं सौंपे गये हों अर्थात्‌ रखवालों के जिम्मे ही रात में भी वे पशु हों तब) उनके योगक्षेम की निन्दा रखवालों की ही होती है।
जो गोरक्षक गायों के स्वामी से वेतन के स्थान में धन नहीं लेकर दूध लेता हो वह दश गायों में एक अच्छी गौ चुनकर वेतन के बदले उसी का दूध लिया करे।
यदि कोई पशु भूल जाय, कृमि आदि से; कुत्ते के काटने से, ऊ॑चे-नीचे स्थान या मार्ग में गिरने से या फँसने से मर जाय, अथवा रखवाले की (उपेक्षाजन्य) पुरुषार्थ-शून्यता से मर या भाग जाय तो उस पशु का देनदार रखवाला ही होता है।
यदि घोषणाकार पशु के चोरी होनेके स्थान के पास में रहने पर रखवाला स्वामी को उसकी चोरी होने की उसी समय सूचना दे दे (अथवा-जोर से चिल्लाकर स्वामी को सूचित कर दे), तब वह उस चुराये गये पशु का देनदार नहीं होता है।
पशुओं (या एक पशु) के स्वयं मरने पर रखवाला उस (पशु) के कान, चमड़ा, बाल (पूँछ के बाल), चर्बी, गोरोचन और अन्य चिह्न (खुर, सींग आदि) लाकर गोस्वामी को दिखलावे।
बकरी या भेड़ को, भेड़िया द्वारा रोके जाने पर यदि रखवाला बचाने के लिए नहीं आवे और उस बकरी या भेड़ को भेड़िया बलात्कारपूर्वक ले जाय तो उसका दोषी रखवाला होता है।
रखवाले के द्वारा घेरने पर वन में झुण्ड बनाकर चरती हुई बकरी या भेड़ को यदि छलाँग मारता हुआ (या चुपचाप अर्थात्‌ धीरे से एकाएक) आकर भेड़िया मार डाले (या ले जाय) तो उसका दोषी चरवाहा नहीं होता है।
ग्राम के चारों तरफ १०० धनुष अर्थात्‌ ४०० हाथ तक या तीन बार छड़ी फेंकने से जितनी दूर जाय उतनी दूर तक नगर के चारों तरफ ग्राम से तिगुनी भूमि पशुओं के घूमने-फिरने के लिए छोड़नी चाहिये (उतनी दूरी तक कोई पौधा या फसल नहीं बोनी चाहिये)।
उतनी (८।२३७) भूमि के भीतर काँटे आदि का घेरा बनाकर बौये गये धान्य आदि को यदि कोई पशु नष्ट कर दे तो राजा पशु के रखवाले को दण्डित न करे।
उतनी (८।२३७) भूमि के भीतर धान्य आदि बोये गये खेत का घेरा यदि इतना ऊँचा हो कि बाहर से उँट धान्य को नहीं देख सके तथा उस घेरे के छिद्र से कुत्ते या सूअर का मुँह भीतर नहीं जा सके इस प्रकार खेत का स्वामी छिद्रों को बंद कर दे।
रास्ते या ग्राम व नगर के पास उक्त (७।२३ ९) घेरेवाले खेत के धान्यादि फसल को पशु, रखवाले के रोकने से, किसी प्रकार घुसकर चरने लगे तो राजा उस रखवाले को सौ पण (८।१३६) से दण्डित करे तथा यदि रखवाले के नहीं रहने पर उक्त खेत में पशु चरने लगे तो खेत का स्वामी उसे भगा दे।
रास्ता तथा ग्राम या नगर के दूर (८।२३७) प्रमाण के बाद खेत में पशु के चरने पर रखवाले को सवा पण (८।१३७) से दण्डित करना चाहिये तथा सम्पूर्ण (या अत्यधिक) खेत के पशुद्वारा चरे जाने पर (अपराध के अनुसार) रखवाले से या पशुस्वामी से पूरी क्षति को खेत के स्वामी के लिए दिलवाना चाहिये ऐसा निश्चय है।
दश दिन के भीतर व्याई हुई गाय, (चक्रत्रिशूल से चिह्नित कर वृषोत्सर्ग में छोड़ा गया) साँड और (काली, शिव या विष्णु आदि) देवताओं के उद्देश्य से छोड़ा गया पशु रखवाले के साथ हो या बिना रखवाले के हो और खेत को चर जाय तो रखवाला दण्डनीय नहीं होता है ऐसा मनु भगवान ने कहा है।
किसान के दोष से उसी के पशुद्वारा खेत चर जाने के कारण अथवा असमय में बोने के कारण जितने राजदेय भाग (राजा को कररूप में देने योग्य अन्न) की हानि हो, उसका दशगुना दण्ड उस किसान को होता है तथा यदि किसान की अजानकारी में उसके नौकरों के दोष से उक्त प्रकार की हानि हो तो उस हानि का पाँच गुना दण्ड उस किसान को होता है।
धर्मात्मा राजा पशुओं के स्वामी तथा रखवालों से पशु-रक्षा नहीं होने के अपराध तथा खेत आदि चरने के व्यतिक्रम होने पर उस नियम (८।२३०-२४३) को लागू करे।
(राजा) दो गाँवों में सीमा का विवाद होने पर ज्येष्ठ मास में सीमा के चिह्वों के स्पष्ट हो जाने पर उसका निर्णय करे।
(राजा) सीमा पर बड़, पीपल, पलाश (ढाक), सेमल, साल, ताड़ और 'दूध वाले (गूलर आदि) पेड़ों को (सीमा के चिह्लों को स्थिर बने रहने के लिए) लगवावे।
(राजा) गुल्म, अनेक प्रकार के बाँस, शमी, लता, ऊ॑चे-ऊंचे मिट्टी के रीले, मूँज, कुब्ज के गुल्मों को सीमापार करे (यथायोग्य लगावे या बनवावे), वैसा करने से सीमा नष्ट नहीं होती है।
संसार में सीमा के विषय में मनुष्यों का मतभेद सर्वदा देखकर (राजा) दूसरे प्रकार के (आगे कहे गये) गुप्त (नहीं दिखलायी पड़नेवाले) सीमा चिहों को भी बनवावे ।
(राजा) तडाग, कुएँ, बावड़ी झरने और देवों के मन्दिरों को दो सीमाओं के सन्धि-स्थल बनवावे ।
पत्थर, हड्डियाँ, गौ (पशुओं) के बाल, भूसा, राख, खोपड़ियाँ, सूखा गोबर, ईंट, कोयला, कङ्कड और रेत।
तथा इस प्रकार की जिन वस्तुओं को पृथ्वी बहुत दिनों तक गलाकर 'अपने में न मिला ले, अर्थात्‌ जो वस्तु पृथ्वी में बहुत दिनों तक गड़े रहने पर भी गलकर 'मिट्टी न बन जाय (जैसे उक्त वस्तुओं के अतिरिक्त-- कपास अर्थात्‌ रूई, काला -अज्ञन इत्यादि), उन्हें सीमा पर अप्रकट रूप में स्थापित करे अर्थात्‌ भूमि के नीचे “गाइ दे ।
राजा परस्पर में विवाद करते हुए रामों की सीमा का निश्चय इन चिह्नों से, लोगों के उपभोग से और नदी नाला आदि के प्रवाह से करे ।
यदि सीमा के इन चिह्लों के देखने पर भी सन्देह ही बना रहे तो साक्षी का कहना ही सीमा के विवाद में निर्णय (प्रमाण) होता है।
(राजा) ग्रामवालों तथा सीमा के विषय में विवाद करनेवाले वादियों एवं प्रतिवादियों के सामने साक्षियों से सीमा के चिहों को पूछें।
(राजा के) पूछने पर वे साक्षी सीमा के विषय में जैसा निश्चय कहें, (राजा) उस सीमा तथा उन गवाहों के नामों को लिख ले।
लाल फूलों की माला तथा लाल कपड़ा पहने हुए वे साक्षी शिर पर मिट्टी (के ढेलों) को रखकर अपने-अपने पुण्यों की शपथ (यदि मैं असत्य वचन इस सीमानिर्णय के विषय में कहूँ तो मेरे आज तक उपार्जित संब पुण्य नष्ट हो जाय इस प्रकार शपथ) कर उस सीमा का यथाशक्ति निर्णय करे।
शास्रानुसार सत्य कहनेवाले वे साक्षी निर्दोष होते हें तथा असत्य कहनेवालो पर (राजा) दो सौ पण दण्ड करे ।
सीमा के साक्षी के नहीं मिलने पर समीपस्थ चार ग्रामों के निवासी शुद्धचित्त होकर राजा के सामने सीमा का निर्णय करें।
समीपस्थ चार ग्रामो में तथा ग्राम निर्माण के समय से वंश परम्परा द्वारा निवास करनेवालों के अभाव में (साक्षी करने के लिए उपस्थित नहीं होने पर) राजा इन वनेचर (सर्वदा या प्राय: वन में ही रहनेवाले) पुरुषों से भी पूछे।
व्याध, बहेलिया (चिड़ियामार), गायों (या भैंस आदि पशुओं) का रखवाला, मल्लाह, जड़ खोदकर जीविका करनेवाला अर्थात्‌ कन्द-मूल (या जड़ी-बूटी बेचनेवाला) सपेरा, शिल तथा उञ्छ करनेवाला तथा दूसरे प्रकार के भी बनवासी, इनसे राजा सीमा के विषय में प्रश्‍न करे ।
(राजा के) पूछने पर वे लोग दो ग्रामों की सीमा की सन्धि (मिलने का स्थान) पर जैसा चिह्न बतलावें, राजा उस सीमा को धर्मानुसार उसी प्रकार स्थापित करे।
एक ग्राम में ही खेत, कुआँ, तालाब, बगीचा तथा घर की सीमा का विवाद उपस्थित होने पर राजा उस ग्राम में रहनेवाले सब लोगों के कहने के अनुसार चली आ रही सीमा के चिह्न निश्चय करे।
दो ग्रामवासियों में परस्पर सीमाविषयक विवाद. उपस्थित होने पर सामन्त (समीपस्थ ग्रामवासी) यदि असत्य कहें तो राजा उनमें से प्रत्येक को मध्यम साहस (८।१३८) से दण्डित करे।
यदि कोई भय दिखाकर घर, तडाग, बगीचा और खेत ले ले (स्वाधीन कर ले), तो राजा उसे ५०० पणों से दण्डित करे तथा आज्ञान से स्वाधीन करने पर २०० पणों (८।१३६) से दण्डित करे।
चिह्यों (८।२४५-२५१) तथा साक्षियों के अभाव में सीमा का निर्णय नहीं होने पर धर्मज्ञ राजा ही ग्रामवासियों के उपकार को लक्ष्यकर स्वयं सीमा का निर्णय कर दे, ऐसी शास्त्रमर्यादा।
(महर्षि भृगुजी ऋषियों से कहते हैं कि--) सीमा के निश्चय करने में सब धर्मो को मैंने कहा, अब कठोर वचन के निश्चय को कहूँगा।
ब्राह्मण से ("तुम चोर हो” इत्यादि) कटु वचन कहने वाला क्षत्रिय सौ पण, वैश्य डेढ़ सौ या दो सौ पण और शूद्र (तारण-मारण आदि) वध से दण्डनीय होते हैं।
ब्राह्मण (“तुम चोर हो” इत्यादि) कटुवचन क्षत्रिय से कहे तो पचास पण, वैश्य से कहे तो पच्चीस पण और शूद्र से कहे तो बारह पण से वह दण्डनीय होता है।
समान वर्ण वाले से (“तुम चोर हो” इत्यादि) कटु वचन कहने वाला द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) बारह पण से दण्डनीय होता है तथा निन्दनीय कटु वचन (माँ-बहन आदि की गाली) कहने पर उक्त दण्डों (८।२६७-२६८५४) को दुगुने पणो से वह दण्डनीय होता है।
द्विज (ब्राह्मण तथा क्षत्रिय) को दारुण वचन से आक्षेप करने वाले शूद्र को उसकी जीभ काटकर दण्डित करना चाहिये; क्योंकि वह नीच से उत्पन्न है।
इन (द्विजातियों-ब्राह्मणादि तीनों वर्णो) के नाम तथा जाति का उच्चारण कर (यज्ञदत्त! तुम नीच ब्राह्मण हो) कटुवचन कहने वाले शूद्र के मुख में जलती हुई दश अंगुल लम्बी लोहे की कील डालनी चाहिए।
राजा अभिमानपूर्वक ब्राह्मणों के लिए धर्मोपदेश (तुम्हें इस प्रकार या यह धर्म करना चाहिए) कहने वाले शूद्र के मुख तथा कान में गर्म तेल डलवावे।
श्रुत (“तुमने यह नहीं सुना या पढ़ा'), देश (“तुम देश में नहीं पैदा हुए हो'), जाति (“तुम्हारी यह जाति नहीं हे') शरीर सम्बन्धी संस्कारादि कर्म (तुम्हारा शरीरसंस्कार-यज्ञोपवीत आदि कर्म नहीं हुआ हे') को अभिमान के कारण असत्य कहने वाले समान वर्ण के व्यक्तियों को राजा दो सौ पणों (८।१३६) से दण्डित करे।
किसी को काना, ल॑गड़ा या इसी प्रकार और कुछ (यथा-बहरा, अन्धा, छांगुर) यथार्थ में होने पर भी उसी दूषित नाम का उच्चारण कर कहने वाले को राजा कम से कम एक पण (८।१३६) से दण्डित करे।
(राजा) माता, पिता, स्री, भाई, पुत्र, गुरु को पातकादि का दोष लगाकर निन्दा करते हुए तथा गुरु के लिए मार्ग नहीं देते (किनारे होकर मार्ग नहीं छोड़ते) हुए व्यक्ति से सौ पण (८।१३६) दण्ड दिलवावे।
दण्डशास्रज्ञ (राजा) ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के परस्पर में पातक-सम्बन्धी निन्दा करने पर (क्षत्रिय की निन्दा करने वाले) ब्राह्मण पर एक प्रथम साहस अर्थात्‌ २५० पण तथा (ब्राह्मण की निन्दा करने वाले) क्षत्रिय पर एक मध्यम साहस (८।१३८) अर्थात्‌ ५०० पण दण्ड करे।
वैश्य तथा शूद्र के परस्पर, अपनी जाति के प्रति पातक सम्बन्धी निन्दा करने पर जिह्वाच्छेद (जीभ काटना) छोड़कर इसी प्रकार (८।१३८) दण्ड देना चाहिये, यह शास्रनिर्णय है।
(भृगुजी ऋषियों से कहते हैं कि) यह (८।२६७-२७७) मैंने वाक्प्रारुष्य (कठोर वचन कहने) का यथार्थ दण्ड कहा है, इसके आगे दंडपारुष्य (मारने-पीटने आदि की कठोरता) का निर्णय कहुँगा।
शूद्र जिस किसी अङ्ग (हाथ आदि) से द्विजाति को मारे (ताड़ित करे); राजा उसके उसी अङ्ग को कटवा डाले, यह मनु का आदेश है।
(राजा) हाथ उठाकर या डंडे (लाठी या छड़ी आदि) से ब्राह्मण को मारने वाले शूद्र का हाथ कटवाले तथा पैर से ब्राह्मण को मारने वाले शूद्र का पैर कटवाले।
(राजा) ब्राह्मण के साथ एक आसन पर बैठे हुए शूद्र की कमर को तपाये गये लोहे से दगवाकर निकाल दे अथवा (जिससे मरने नहीं पाये इस प्रकार) उसके नितम्ब को कटवा ले।
शूद्र यदि ब्राह्मण का अपमान दर्प के कारण थूक फेंककर करे तो राजा उस (शूद्र) के दोनों ओष्ठों को, मूत्र फेंककर करे तो उसके लिङ्ग (मूत्रेन्द्रिय) को तथा अपशब्द (पाद) कर करे तो उसके गुदा को कटवा ले।
शूद्र यदि अभिमान से ब्राह्मण के बालों को पकड़ ले तो राजा (उस ब्राह्मण को इससे कष्ट हुआ अथवा नहीं, इसका) बिना विचार किये उस शूद्र के दोनों हाथों को कटवा ले और अभिमानपूर्वक मारने के लिए ब्राह्मण के दोनों पैरों, दाढ़ी, गर्दन तथा अंडकोष को शूद्र यदि पकड़ ले तो उसे वही (दोनों हाथ कटवाने का) दंड करे।
समान जातिवाला यदि (मारने से) किसी का चमड़ा निकाल दे अर्थात्‌ ऐसा मारे कि आहत व्यक्ति का चमड़ा छूट जाय या रक्त बहने लगे तो सौ पण का दंड, मांस निकल आवे तो ६ निष्क (८।१३७) का दंड और हड्डी टूट जाय तो राज्य से बाहर निर्वासन का दंड अपराधी को सजा दे।
वृक्ष आदि सब पौधों के फल, फूल, पत्ता तथा लकड़ी आदि के द्वारा जैसा-जैसा उपयोग होता हो, उनको (काटने आदि से) नष्ट करने वाले अपराधी को वैसा-वैसा ही दण्ड (उत्तम साहस आदि) देना चाहिए ऐसा शास्त्रनिर्णय है।
मनुष्यों या पशुओं को दुःखित करने के लिए मारने पर उन्हें (मनुष्यों या पशुओं को) जैसी-जैसी (कम या अधिक) पीडा हो; उस पीड़ा के अनुसार ही (कम या अधिक) दण्ड से उक्त पीडा पहुँचाने वाले व्यक्ति को दण्डित करना चाहिये।
अङ्ग के कटने, टूटने घाव होने या रक्त बहने पर रोगी (आहत व्यक्ति) के पूर्वावस्था में आने अर्थात्‌ स्वस्थ होने तक (औषधादि में) जो व्यय हो, उसे राजा अपराधी से दिलवावे (और यदि अपराधी उक्त व्यय को नहीं देना चाहे तब राजा) उक्त (औषधादि के) व्यय को और पीड़ा पहुँचाने पर विहित शास्त्रोक्त दण्ड को भी दिलवावे।
जो मनुष्य जिस किसी की वस्तु को जान-बूझकर या आज्ञानावस्था में नष्ट करे तो वह मनुष्य नष्ट हुई वस्तु का (वास्तविक) मूल्य उस वस्तु के स्वामी को तथा उतना ही मूल्य दण्ड-स्वरूप राजा को दे।
चमड़ा, चमड़े से बने पदार्थ (रस्सी, घी-तेल का कुप्पा, जूता आदि), लकड़ी और मिट्टी के बर्तन, फूल, मूल, (कन्द) तथा फल को नष्ट करने वाला व्यक्ति नष्ट हुए पदार्थों के मूल्य का पाँच गुना धन राजा को दण्ड-स्वरूप में दे, (तथा उन पदार्थो के स्वामी को उन नष्ट पदार्थो का मूल्य देकर तुष्ट करे)।
रथ, गाड़ी आदि सवारी, सारथि (उनका चालक गाड़ीवान, एक्कावान, कोचवान आदि) और स्वामी, इन पर वक्ष्यमाण (८।२९ १-२९२) दश अवस्थाओं में किसी के मर जाने या किसी सामान के नष्ट हो जाने पर दण्ड नहीं किया जाता तथा इन (वक्ष्यमाण-८।२९ १-२९२) दश अवस्थाओं के अतिरिक्त अवस्था में दण्ड किया जाता है।
(१) बैल के नाथ टूट जाने पर, (२) जूवा के टूट जाने पर, (३) भूमि के ऊँची-नीची होने से गाड़ी के तिर्छा (एकवाई) हो जाने पर, (४) उलट जाने पर, (५) धूरा टूट जाने पर, (६) पहिया टूट जाने पर,
(७) चमड़े (या रस्सी आदि) के जोड़ कट (या खुल), जाने पर (८) जोता (बैल आदि रथवाहक पशु के गले में लगी हुई रस्सी) के टूट जाने पर, (९) रास (सारथि के हाथ द्वारा पकड़ी जाने वाली रस्सी) के टूट जाने पर और (१०) “हट जावो, हट जावो” ऐसा सारथि के चिल्लाने पर (यदि कोई वस्तु नष्ट हो जाय या कोई मर जाय तो सारथि आदि) कोई दंडनीय नहीं होता है ऐसा मनु ने कहा है।
जहाँ सारथि की मूर्खता से रथ के इधर-उधर अर्थात्‌ उल्टा-सीधा होने के कारण कोई मर जाय तो (मूर्ख सारथि रखने के कारण उसके स्वामी पर) दो सौ पण (८।१३६) दण्ड होता है।
यदि सारथि चतुर हो (और कोई वस्तु नष्ट हो जाय) तो वही (सारथि ही) दो सौ पण से दण्डनीय होता है तथा यदि सारथि चतुर नहीं हो तो उस (रथ गाड़ी आदि) पर सवार होने वाले प्रत्येक व्यक्ति (मूर्ख सारथि वाले सवारी पर चढ़ने के कारण) सौसौ पण से दण्डनीय होते हैं (और स्वामी को दो सौ पण से दण्डनीय होने का विधान पहले) (८।२९३ कह ही चुके हैं)।
मार्ग में रथ-पशुओं या रथादि से रुका हुआ भी सारथि रथ (गाड़ी आदि) हांके और (उसी कारण) किसी की मृत्यु हो जाय तो राजा बिना विचार किये अर्थात्‌ शीघ्र ही उस सारथि को दण्डित करे।
(अब एक बार अपराध होने पर दण्ड-विधान कहते हैं--) सारथि की असावधानी से मनुष्य के मर जाने पर उसे (सारथि को) चोर के समान पाप लगता है (अतः वह उत्तम साहस” अर्थात्‌ १००० पण से दण्डनीय होता है), तथा बड़े जीव, ऊंट, गाय, बैल, हाथी, घोड़ा आदि के मरने पर आधा पाप लगता है (अत: वह “मध्यम साहस” अर्थात्‌ ५०० पण से दण्डनीय होता है)।
(स्वरूप अर्थात्‌ कद या आयु में) छोटे पशुओं के मर जाने पर दो सौ पण तथा शुभ मृग (रुरु, पृषत्‌ आदि जाति का हरिण) और शुभ पक्षी (शुक, मैना, हंस, सारस आदि) के मर जाने पर पचास पण से वह सारथि दण्डनीय. होता है।
गधा, बकरी, भेड़ के मर जाने पर पाँच मासा (चाँदी) तथा कुत्ता और सूअर के मर जाने पर एक मासा चाँदी से वह सारथि दण्डनीय होता है।
स्री, पुत्र, दास, प्रेष्य (बाहर भेजा जानेवाला नौकर), सहोदर (छोटा) भाई यदि अपराध करे तो उसे रस्सी से या पतली बाँस की छड़ी से (शिक्षार्थ) ताडून करना चाहिये।
(अभिभावक) उन्हें (रस्सी या पतली बाँस की छड़ी) से पीठ पर मारे, मस्तक पर कदापि न मारे अन्यथा मस्तक पर मारता हुआ मनुष्य चोर के समान पाप (वाग्दण्ड, बनधन दण्डादि) का भागी होता है।
(महर्षियों से भृगु जी कहते हैं कि--) मैंने यह (८।२७९-३००) दण्ड की कठोरता का निर्णय पूर्णतया कहा, अब इसके आगे (८।३०१-३४४) चोर के दण्ड के निर्णय का विधान कहुँगा।
राजा चोरों का निग्रह करने के लिए पूर्णतया प्रयत्न करे; क्योंकि चोरी के निग्रह से इस (राजा) के यश तथा राज की वृद्धि होती है।
जो राजा (प्रजाओं को चोरों से) अभय करने वाला है वह अवश्यमेव पूज्य (प्रशंसनीय) है; क्योंकि उस (चोरों से अभय करने वाले राजा) का अभयरूपी दक्षिणा वाला यज्ञ सर्वदैव बढ़ता है।
प्रजाओं की रक्षा करने वाले राजा को सबके धर्म का छठा भाग प्राप्त होता है और (प्रजा की) रक्षा नहीं करने वाले राजा को अधर्म का भी छठा भाग प्राप्त होता है।
(राज्य में रहने वाली प्रजा) जो (वेदादि) पढ़ती है, यज्ञ करती हे, दान देती है तथा (देवादि का) पूजन करती है; उस (पुण्य) का छठाँ भाग अच्छी तरह (प्रजा की) रक्षा करने वाले राजा को प्राप्त होता है।
(निरपराध स्थावर-जङ्गम सब) जीवों की धर्मपूर्वक रक्षा करता हुआ तथा वधयोग्य जीवों का वध करता हुआ राजा प्रतिदिन सहस्रों-सैकड़ों दक्षिणा वाले यज्ञों को करता रहता है।
(प्रजाओ की) रक्षा नहीं करता हुआ जो राजा बलि, कर, शुल्क (टैक्स) तथा प्रतिभाग दण्ड को (प्रजाओं से) लेता है; (मरकर) तत्काल नरक को जाता है।
(निर्दोष प्रजा की दुष्ट चौरादि से) रक्षा नहीं करता हुआ तथा (प्रजा से) छठे भाग के रूप में बलि (राजग्राह्य भाग) को लेता हुआ सब लोकों के सब पापों का हरण (ग्रहण) करने वाला होता है, ऐसा मनु आदि ऋषि कहते हैं।
शास्तरमर्यादा को नहीं मानने वाले, नास्तिक, (लोभादि के वशीभूत होकर) अनुचित दण्ड आदि के द्वारा धन लेने वाले, रक्षा नहीं करने वाले और (कर, बलि आदि का) भोग करने वाले राजा की अधोगति जाननी चाहिये।
(अतएव धार्मिक राजा अपराध के अनुसार) विरोध (हवालात या कैदखाने में बन्द) करना, बन्धन (हथकड़ी, बेड़ी आदि डालना) और अनेक प्रकार के वध (ताडनमारण आदि); इन तीन उपायों से अधार्मिक (चोर आदि) का प्रयत्नपूर्वक निग्रह (कर उन्हे दण्डित) करे।
पापियो के निग्रह (दण्डित कर रोकथाम करने) तथा सज्जनों पर अनुग्रह करने से राजा, यज्ञों से द्विजातियों के समान सर्वदा पवित्र अर्थात्‌ पुण्यवान्‌ होता है।
स्व-हित-कर्त्ता राजा (दुःखित) वादी तथा प्रतिवादी (मुद्द और मुद्दालह) के और बालक, बूढ़े और आर्त (रोगी आदि) के आक्षेपों को सहन करे।
जो राजा दुःखितो के आक्षिप्त (कठोर वचनों को) सहता है, उससे वह स्वर्ग में पूजित होता (आदर पाता) है; किन्तु जो ऐश्वर्य (स्वामित्व के अभिमान) से (दुःखितो के आक्षेपों को) नहीं सहता है, उससे वह नरक जाता है।
ब्राह्मण के सुवर्ण को चुराने वाला चोर कन्धे पर मुसल या खैर कत्थे की लाठी या दोनों ओर तेज शक्ति (दोनों ओर धार वाली बर्छी) या लोहे का डण्डा लिये तथा
बालों को खोले हुए दोड़कर राजा के पास जाकर "मैने ऐसा कार्य (ब्राह्मण के सुवर्ण की 'चोरी) किया है, मुझे दण्डित कीजिए” ऐसा राजा से कहे।
(मुशल आदि-पूर्व श्लोकोक्त (८।३१५) शस्त्रों में से जिस शस्त्र को चोर लाया हो उससे) एक बार राजा के द्वारा मारने के कारण प्राणत्याग करने से या मरे हुए के समान जीवित भी उस चोर को छोड देने से वह चोर चोरी के पाप से छूट जाता है; किन्तु (दया आदि के कारण) उसे दण्डित नहीं करने वाला उस चोर के पाप को प्राप्त करता है।
भ्रूणहत्या करने वाला अपने (भ्रूणहत्या करने वाले का) अन्न खाने वाले को, व्व्यभिचारिणी स्त्री (जार को सहने अर्थात्‌ मना नहीं करने वाले) पति को, शिष्य (सन्ध्याव्वन्दनादि नित्य-कृत्यत्याग को सहने वाले) गुरु को, याज्य अर्थात्‌ यजमान (विधि का त्त्यागकर यज्ञादि कर्म करते रहने पर भी उसे सहन करने वाले अर्थात्‌ विधिपूर्वक यज्ञादि व्कर्म को करने के लिए प्रेरित नहीं करने वाले) गुरु को और चोर (दण्डित नहीं करने वाले) राजा को अपना-अपना अपराध (पापजन्य दोष) दे देते हैं।
मनुष्य पाप करके राजा से दण्डित होकर पापरहित हो (अपने दूसरे पुण्य कर्मो के प्रभाव से), पुण्यात्माओं के समान स्वर्ग को जाते हैं।
जो कुएँ की रस्सी या घड़ा चुराता है अथवा प्याऊ (पौसरा) तोडता है वह एक मासे सुवर्ण से दण्डनीय होता है और उसे उक्त चोरित रस्सी तथा घड़े को लाना तथा प्याऊ को बनवाना भी पड़ता है।
राजा दश कुम्भ से अधिक धान्य (अन्न) चुराने वाले को वध (चुराने वाले तथा धान्य के स्वामी के गुणादि के अनुसार ताडून, अङ्गच्छेदन एवं वध तक) से दण्डित करे। शेष (एक कुम्भ से अधिक दस कुम्भ तक धान्य चुराने के अपराध) में चुराये हुए धान्य के ग्यारह गुने धान्य से चोर को दण्डित करे और धान्य के स्वामी का जितना धान्य चुराया गया हो उतना वापस दिलवा दे।
और काँटे से तौलने योग्य सोना, चाँदी आदि तथा उत्तम वस्त्र सौ पल से अधिक चुराने वाले को राजा वध (देश, काल, चोर, द्रव्य के स्वामी की जाति तथा गुण की अपेक्षा से ताडन अङ्गच्छेदन और मारण तक) से दण्डित करे।
(सोना, चाँदी आदि काँटे पर तौलकर बेची जाने वाली वस्तु तथा बहुमूल्य रेशमी वस्रादि को) ५० पल से अधिक १०० पल तक चुराने वाले का हाथ काटने का दण्ड (मनु आदि ने) कहा है और शेष (एक पल से पचास पल तक उक्त वस्तुओं को चुराने के अपराध) में राजा चोरित वस्तु का ग्यारह गुना दण्ड निश्चत करे।
श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न पुरुष तथा विशेषत: स्त्रियों और मुख्य रत्न (माणिक्य हीरा, वैदूर्यं आदि) की चोरी करने वाला वध के योग्य होता है अर्थात्‌ राजा को उक्त चोरी करने वाले का वध करना चाहिये।
बड़े पशु (हाथी, घोड़ा, ऊंट, बैल, गाय, भैंस आदि) के, तलवार आदि शख्रों के और औषधों के चुराने पर राजा समय (अकाल, दुर्भिक्ष आदि), कार्य (चोरित का भले-बुरे कार्यो में उपयोग आदि) को देखकर चोर के लिए दण्ड का निश्चय करे।
ब्राह्मण की गाय चुराने पर, वन्ध्या गाय को लादने के लिए नाथने पर और यज्ञार्थ लादे गये बकरा आदि पशु को चुराने पर राजा अपराधी (चोर) का आधा पैर तत्काल कटवा दे।
(ऊन आदि का) सूत, कपास (रूई), सुरा-बीज, गोबर, गुड़ दही, दूध, छाछ, पेय (पीने योग्य शर्बत या जल आदि) पदार्थ, घास।
बाँस के बने सर्वविध बर्तन (या पानी लाने के लिए महीन बाँस के टुकड़ों से बने विशेष प्रकार के बर्तन), नमक, मिट्टी के बर्तन या खिलौने आदि, मिट्टी, राख।
मछली, पक्षी, तैल, घी, मांस, मधु (शहद) और पशुओं से उत्पन्न होने वाले पदार्थ (जैसे सींग, खुर, चमड़ा आदि; हाथी के दाँत और हड्डी आदि।
इसी प्रकार के दूसरे पदार्थ (मैनसिल, शिलाजीत आदि), मद्य (बारह प्रकार के मादक पदार्थ या मदिरा), भात तथा सभी प्रकार के पकवान (पुआ पूड़ी, कचौड़ी मिठाई आदि) के चुराने पर चोरित वस्तु का दुगुना दण्ड चोर पर करना चाहिये।
फूल, हरा धान्य, विना घेरे हुए गुल्म, वेलि, वृक्ष, बिना साफ किये (नहीं ओसाये गये) धान्य के (बाँधकर भरपूर बोझ को) चुराने वाले पर (देश, काल, पात्र आदि के अनुसार सोने या चाँदी का) पाँच 'कृष्णल' (८।१३४) अर्थात्‌ एक आना भर दण्ड करना चाहिये।
साफ किये हुये धान्य, शाक, मूल (कन्द या जड़), फल को चौर्य पदार्थ के स्वामी के साथ किसी प्रकार का (एक गाँव में हरना आदि) सम्बन्ध नहीं रहने पर चोरी करने वाले व्यक्ति पर सौ पण तथा चौर्य वस्तु के स्वामी के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध रहने पर चोरी करने वाले व्यक्ति पर (८।१३६) दण्ड करना चाहिये।
वस्तु-स्वामी के सामने से बलात्कारपूर्वक किसी वस्तु का अपहरण करना 'साहस' (डाका डालना) और वस्तुस्वामी के परोक्ष में (नहीं रहने पर चुपके से) किसी वस्तु का अपहरण कर भाग जाना (या अपहरण करने के बाद में अस्विकार करना) "स्तेय" (चोरी करना) कहलाता है।
जो साफ-सुथरी करके उपभोग में लाने योग्य बनायी गयी सूत्र आदि (८।३२६-३२९) वस्तुओं की तथा अग्निहोत्र से त्रेताग्नि की चोरी करे; राजा उसको प्रथम साहस (८।१३८ अर्थात्‌ २५० पण) से दण्डित करे।
चोर जिस-जिस अङ्ग (हाथ, पैर आदि) से जिस प्रकार मनुष्यों में कुचेष्टा (चोरी करना, सेंध मारना आदि दुष्कर्म) करे; राजा फिर वैसा अवसर नहीं आवे, इसके लिए उस चोर के उस-उस अङ्ग को कटवा ले।
पिता, आचार्य, मित्र, माता, स्त्री, पुत्र और पुरोहित इनमें जो अपने धर्म में नहीं रहता, वह क्या राजा का दण्डनीय नहीं है? अर्थात्‌ पूज्य या निकट सम्बन्धी होने पर भी वह दण्डनीय ही है।
जिस अपराध में साधारण मनुष्य एक पण से दण्डनीय है, उसी अपराध में राजा सहस्र पण से दण्डनीय है, ऐसा शास्त्र का निर्णय है।
चोरी के गुण तथा दोष को जानने वाले शूद्र के चोरी करने पर चोरी के विषय में शूद्र को आठगुना, वैश्य को सोलहगुना, क्षत्रिय को बत्तीसगुना और
ब्राह्मण को चौसठ-गुना या सौ गुना या एकसौ आड्टाइस गुना पाप होता है; क्योंकि वह उस (चोरी) के गुण और दोष का जानकार है। (अतएव अपराधानुसार उक्त शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण उत्तरोत्तर दण्डनीय होते हैं)
(बिना घेरी हुई) वनस्पतियों के मूल तथा फल, अग्निहोत्र के लिए समिधा (हवनकाष्ठ) और गोग्रास के लिए घास ग्रहण करने को मनु ने चोरी नहीं कहा हे।
जो ब्राह्मण नहीं दी गयी वस्तु (या धन) को चुराने वाले चोर के हाथ से यज्ञ कराने या पढ़ाने की दक्षिणा भी (“यह दूसरे का है" ऐसा जानता हुआ) लेने की इच्छा करे तो जैसा चोर है वैसा वह ब्राह्मण भी है, (अतएव ऐसा ब्राह्मण भी चोर के समान दण्डनीय है)।
पाथेय (रास्ते के कलेवा) से रहित द्विज पथिक यदि दूसरे के खेत से दो गन्ने (ऊख) या दो मूली ग्रहण कर ले तो वह दण्डनीय नहीं होता है।
बिना बँधे हुए दूसरे के पशु (घोड़ा, गाय, बैल, बछवा आदि) को बाँध लेने वाला, बाँधे हुए दूसरे के पशुओं को खोल देने वाला तथा दास, घोड़ा और रथ (गाड़ी, तागा, एक्का आदि सवारी को) चुराने वाला (बड़े-छोटे अपराध के अनुसार अधिक या कम) चोर के समान (मारण, अङ्गच्छेदन, धनादि ग्रहण अर्थात्‌ जुर्माना आदि) दण्ड के द्वारा दण्डनीय होता है।
इस विधि (३०१-३४२) से चोर को दण्डित करता हुआ राजा इस लोक में ख्याति तथा मरकर परलोक में अनुत्तम सुख पाता है।
ऐन्द्र पद (सबका आधिपत्यरूप सर्वश्रेष्ठ) अक्षय पद तथा अव्यय यश को चाहने वाला राजा क्षणमात्र भी साहसिक (बलात्कार से गृहदाह तथा जन-धन का अपहरण करने वाले अर्थात्‌ डाकू) व्यक्ति की उपेक्षा न करे, (किन्तु तत्काल उन्हें दण्डित करे।
कटु वचन बोलने वाला, चोर और डण्डे (या लाठी या शस्नादि) से मारपीट करने वाला, इन तीनों की अपेक्षा साहस (बलात्कारपूर्वक धन-जन का अपहरण) करने वाला मनुष्य अधिक पापी होता है।
साहस (बलात्कार से धन-जनापहरण आदि) कर्म में तत्पर मनुष्य को जो राजा क्षमा करता है, वह शीघ्र ही नष्ट होता तथा प्रजा का विद्वेषपात्र भी बनता है।
यह स्वयं को बचाने और धर्म के लिए लड़ने के बारे में भी है।
ऐन्द्र पद (सबका आधिपत्यरूप सर्वश्रेष्ठ) अक्षय पद तथा अव्यय यश को चाहने वाला राजा क्षणमात्र भी साहसिक (बलात्कार से गृहदाह तथा जन-धन का अपहरण करने वाले अर्थात्‌ डाकू) व्यक्ति की उपेक्षा न करे, (किन्तु तत्काल उन्हें दण्डित करे।
राजा मित्रता या अधिक धन-प्राप्ति के कारण से, सम्पूर्ण प्रजाओं को आतङ्कित करने वाले साहसिक (डाकू) को भी न छोड़े अर्थात्‌ उसे अवश्य दण्डित करे।
साहसी (डाकू) मनुष्यों के कारण द्विजों तथा ब्रह्मचर्य आदि आश्रमः वासियों के धर्म का अवरोध होने में, समय-प्रभाव से राज्य के अराजक हो जाने के कारण युद्ध आदि की सम्भावना में, आत्मरक्षा में, दक्षिणा-द्रव्य (गौ आदि) के अपहरण-सम्बन्धी युद्ध में तथा स्त्रियों और ब्राह्मणों की रक्षा में द्विजातियों को शस्त्र ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि धर्मपूर्वक अपराधी को मारता हुआ मनुष्य पापी नहीं होता है।
गुरु, बालक, बूढ़ा अथवा बहुश्रुत ब्राह्मण भी आततायी होकर आता हो तो उसे बिना विचारे अर्थात्‌ तत्काल मारना चाहिए।
सबके सामने या एकान्त में (मारने आदि के लिए उच्यत) आततायी के वध करने में वधकर्त्ता को दोष नहीं होता है; क्योंकि मारने वाले अर्थात्‌ आततायी का क्रोध मारे जाते हुए के क्रोध को बढ़ाता है।
परस्त्री-सम्भोग में प्रवृत्त होने वाले मनुष्य को राजा व्याकुल करने वाले दण्डो (नाक, ओष्ठ, कान आदि कटवा लेना) से दण्डित करके उसे देश से निकाल दे।
क्योंकि परस्त्री सम्भोग में वर्णशङ्कर (दोगला) पुत्र उत्पन्न होता है, जिस वर्णसङ्कर से मूल को नष्ट करने वाला अधर्म सबके नाश के लिए समर्थ होता है।
पहले परस्त्री-सम्भोग-विषयक निन्दा से युक्त जो पुरुष एकान्त में परस्त्री से बातचीत करता हो, उसे प्रथम साहस (८।१३८ अर्थात्‌ २५० पण) से दण्डित करना चाहिए।
पहले कभी भी परस्री-सम्भोग के विषय में अनिन्दित पुरुष किसी कारण से परस्री के साथ एकान्त में बातचीत करे तो वह कुछ दोषी नहीं होता है, क्योंकि उसका कोई अपराध नहीं है।
पहले परस्त्री-सम्भोग के विषय में अनिन्दित भी जो पुरुष नदी के किनारे (लता गुल्म आदि से घिरे हुए), अरण्य में, घने वृक्ष आदि से युक्त वन में, अथवा नदियों के सङ्गम स्थान अर्थात्‌ एकान्त में परस्त्री के साथ बातचीत करता है; वह पुरुष “स्त्रीसंग्रहण” (८।३५७) के दण्ड (१००० पण) से दण्डनीय है।
परस्त्री के पास सुगन्धित तेल-फुलेल, इत्र-माला आदि भेजना, केलि (हंसी-मजाक आदि) करना, उसके भूषण तथा वस्त्रों का स्पर्श करना और साथ में एक खाट पर बैठना (यहाँ सर्वत्र निर्जन अर्थात्‌ बिलकुल एकान्त स्थान से तात्पर्य है) ये सब कार्य मनु आदि ऋषियों के द्वारा 'संग्रहण' कहा गया है।
यदि पुरुष परस्त्री के अस्पृश्य अङ्ग (जङ्घा, स्तन, गाल आदि अङ्ग) का स्पर्श करे, या उसके द्वारा अपने अङ्ग से स्पर्श करने पर सहन करे (रुष्ट नहीं होवे), ये सब कार्य परस्पर में अनुमति (राजीखुशी) से हो तो ये संग्रहण” कहे गये हैं।
अब्राह्मण अर्थात्‌ शुद्र पुरुष यदि सम्भोगादि की इच्छा नहीं करने वाली ब्राह्मणी का “संग्रहण" (८।३५७-३५८) करे तो वह प्राणदण्ड (फाँसी देने) के योग्य होता है; क्योंकि चारों वर्णो की स्त्रीयाँ सर्वदा रक्षणीय हैं।
भिक्षुक, वन्दी (चारण, भाट आदि) दीक्षित (यज्ञ के लिए दीक्षा ग्रहण किया हुआ। रसोइया (पाचक) परस्त्री के साथ अनिवारितरूप में बातचीत करे अर्थात्‌ इनका बातचीत करना 'संग्रहण' नहीं है अतएव परस्त्री के साथ बातचीत करने पर ये दण्डनीय भी नहीं है।
(स्वामी, स्त्री का पति या अन्य अभिभावक के) मना करने पर पुरुष परस्त्री के साथ बातचीत न करे, मना करने पर (परस्त्री के साथ) बातचीत करता हुआ पुरुष सौ सुवर्ण (८।१३५) से दण्डनीय होता है।
स्त्रियों के साथ बातचीत करने के निषेध का यह (८।३५४-३६१) विधान नट तथा गायको की स्त्रियों के साथ बातचीत करने में नहीं है; क्योंकि वे (नट, गायक आदि) अपनी स्त्रियों को (शृङ्गार आदि के द्वारा) सुसज्जित कर दूसरों से मिलाते तथा छिपकर स्त्रियों के साथ सम्भोग करते हुए परपुरुष को देखते हैं।
(तथापि चरणादि की स्त्रियों, दासियों, बौद्धमतावलम्बिनी स्त्रियो, ब्रह्म चारिणियों से एकान्त में बातचीत करते हुए मनुष्यों को राजा साधारणतम दण्डित करे, (क्योंकि ये सब भी परस्त्री ही हे, अतएव उनके साथ एकान्त में बातचीत करने से दोष लगता ही है)।
समानजातीय कोई पुरुष सम्भोग की इच्छा नहीं करती हुई कन्या को सम्भोग के द्वारा दूषित करे तो वह (ब्राह्मणेतर जाति का होने पर) शीघ्र ही लिङ्गच्छेदन आदि रूप वध से दण्डनीय होता है और सम्भोग की इच्छा करती हुई कन्या को दूषित करने वाला समाजातीय पुरुष (उक्त लिङ्गच्छेदनादि) वध से दण्डनीय नहीं होता (क्योंकि उक्त कार्य गान्धर्व विवाह (३।३२) माना जाता है)।
अपने से श्रेष्ठ जाति वाले पुरुष के साथ सम्भोग करती हुई कन्या को (राजा) थोड़ा भी दण्डित न करे, किन्तु अपने से हीन जाति वाले पुरुष का सेवन करती हुई कन्या को यत्नपूर्वक घर में रोक रक्खे (जिससे उसकी कामेच्छा निवृत्त हो जाय)।
हीनजातीय पुरुष अपने से श्रेष्ठ जाति वाली (सम्भोग की इच्छा करती हुई या नहीं करती हुई) कन्या के साथ सम्भोग करे तो वह (जात्यनुसार लिङ्गच्छेदन, ताडन या मारण आदि) वध के योग्य है तथा समान जातिवाली कन्या के साथ सम्भोग करे और उस कन्या का पिता उस कर्म को स्वीकार करे तो उसे उचित मात्रा में धन देवे (तथा उस कन्या के साथ विवाह कर ले)।
जो पुरुष समानजाति वाली कन्या के साथ सम्भोग न करके बलात्कारपूर्वक उसकी योनि (मूत्रमार्ग) में अङ्गुलि डालकर उसे दूषित करे, राजा उसको अङ्गुलि को शीघ्र कटवा ले तथा उसे ६०० पण (८।१६६) दण्डित करे।
समान जातिवाली कामवासनायुक्त कन्या के साथ सम्भोग न करके उसकी योनि में अङ्गुलि डालकर जो पुरुष उस कन्या को दूषित करे; राजा उस पुरुष की अङ्गुलि तो नहीं कटवावे, किन्तु भविष्य में ऐसे प्रसङ्ग को रोकने के लिए उसे २०० पण (८॥१३६) से दण्डित करे।
यदि कोई कन्या ही किसी दूसरी कन्या की योनि में अङ्गुलि डालकर उस कन्या को दूषित करे तो राजा कन्यात्व नष्ट करने वाली उस कन्या को २०० पण से दण्डित करे, दुगुना (४०० पण) उस दूषित कन्या के पिता के लिए दिलवावे तथा दश कोड़े या बेत से उसे दण्डित करे।
यदि कोई स्त्री किसी कन्या की योनि में अङ्गलि डालकर उस कन्या को दूषित करे तो राजा तत्काल उस स्त्री का शिर मुँड़वा दे, अङ्गुलि कटवा ले तथा गधे पर चढ़ाकर उस स्त्री को सड़कों पर घुमवावे।
जो स्त्री पिता या बान्धवों के अधिक धनी होने या अपने सौन्दर्य के अभिमान से परपुरुष के साथ सङ्गति करके अपने पति का अपमान करे, उसे राजा बहुत लोगों से युक्त स्थान में (सबके सामने) कुत्तों से कटवावे।
और उस पापी जार को तपाये हुए लोहे की खाट पर सुलाकर जलावे तथा उस खाट पर लोग लकड़ी डाल दें, जिसमें वह पुरुष जल (कर मर) जाय।
परस्त्री-गमन से दूषित (अदण्डित भी) पुरुष एकवर्ष के बीतने पर पुन: परस्त्रीगमन रूप अपराध करे तो उसे पूर्वोक्त दण्ड से दुगुना दण्ड होता है; तथा हत्या (१०।२०) तथा चाण्डाली (१०।२६-२७) के साथ गमन (सम्भोग) करने पर भी उतना (दुगुना) ही दण्ड होता है।
(पति या अभिभावक के द्वारा) सुरक्षित या असुरक्षित द्विज-स्त्री के साथ सम्भोग करने वाले शूद्र को, असुरक्षित द्विज स्त्री के साथ सम्भोग करने पर उसके लिङ्ग को कटवाकर तथा धन को जप्तकर दण्डित करे तथा सुरक्षित द्विज-स्त्री के साथ सम्भोग करने पर उसकी सब सम्पत्ति को जप्तकर उसे प्राणदण्ड से दण्डित करे।
(पति आदि से सुरक्षित ब्राह्मणी के साथ सम्भोग करने पर) वैश्य को १ वर्ष तक जेल में रखने के बाद सर्वस्व हरण का दण्ड (जुर्माना) देना चाहिए और क्षत्रिय को १००० पण का दण्ड देना चाहिए एवं उसका सिर गधे के मूत्र से मुँडवा देना चाहिए
(पति या अभिभावकादि के द्वारा असुरक्षित) ब्राहमण-स्त्री के साथ यदि वैश्य सम्भोग करे तो राजा उस पर ५०० पण तथा यदि क्षत्रिय गमन करे तो उस पर १००० पण दण्ड (जुर्माना) करे।
(पति आदि से सुरक्षित तथा) गुणवती ब्राह्मणी के साथ यदि वे दोनों (वैश्य तथा क्षत्रिय) मैथुन करें तो वे शूद्र के समान (८।३७४) दण्डनीय हैं या तृणाग्नि में जलाने योग्य हैं।
(पति या अभिभावक के द्वारा) सुरक्षित ब्राह्मणी के साथ बलात्कारपूर्वक सम्भोग करने वाला ब्राह्मण १००० पण से तथा सम्भोग की इच्छा करने वाली ब्राह्मणी के साथ सम्भोग करने वाला ब्राह्मण ५०० पण (८।१३६) से दण्डनीय होता है।
ब्राह्मण को प्राणदण्ड होने पर उसका मुण्डन करा देना ही उसका प्राणदण्ड होता है तथा अन्य वर्णो (क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) का प्राणनाश करना ही प्राणदण्ड होता है।
राजा समस्त पाप करने वाले भी ब्राह्मण का वध कभी न करे; किन्तु सम्पूर्ण धन के साथ अक्षत शरीर वाले उस (ब्राह्मण) को राज्य से निर्वासित कर दे।
ब्राह्मण वध के समान पृथ्वी पर दूसरा कोई बड़ा पाप नहीं है, अतएव राजा मन से भी ब्राह्मण के वध करने का विचार न करे।
(पति आदि के द्वारा सुरक्षित) क्षत्रिया के साथ वैश्य तथा वैश्या के साथ क्षत्रिय सम्भोग करे तो वे अरक्षित ब्राह्मणी के साथ सम्भोग करने पर कहे गये दण्ड से (८३७६ के अनुसार वैश्य ५०० पण तथा क्षत्रिय १००० पण) दण्डनीय है।
(पति या अभिभावकादि से सुरक्षित) क्षत्रिया या वैश्या के साथ में संभोग करने वाला ब्राह्मण १००० पण से दण्डनीय है तथा सुरक्षित शूद्रा के साथ संभोग करने वाले क्षत्रिय और वैश्य भी १०००-१००० पण (८।१३६) से ही दण्डनीय होते है।
(पति आदि से) अरक्षित क्षत्रिया के साथ सम्भोग करने वाले वैश्य को ५०० पण दण्ड होता है और क्षत्रिय को गधे के मूत्र से शिर मुंडवाने का या ५०० पण का दण्ड होता है।
(पति आदि से असुरक्षित) क्षत्रिया, वैश्या अथवा शूद्रा के साथ सम्भोग करने वाला ब्राह्मण ५०० पण से तथा अन्त्यज स्त्री (चाण्डाली आदि सर्वाधम स्त्री) के साथ सम्भोग करने वाला (ब्राह्मण) १००० पण से दण्डनीय होता है।
जिस (राजा) के राज्य में चोर, परस्त्री-सम्भोग करने वाला, कठोर वचन बोलने वाला, गृहदाह आदि साहस कार्य करने वाला तथा कठोर दण्ड (ताडनमारण आदि दण्ड पारुष्य) करने वाला पुरुष नहीं है, वह (राजा) स्वर्गगमन करता है।
इन पाँचों (चोर, परस्त्री सम्भोगकर्ता, कटुभाषणकर्त्ता, साहसकर्मकर्त्ता और दण्डपारुष्यकर्त्ता) का अपने राज्य में निग्रह करने वाला राजा समानजातीय राजाओं में साम्राज्य करने वाला तथा इस लोक में यशस्वी होता है।
जो यजमान (कर्मानुष्ठान में समर्थ) पुरोहित का और पुरोहित (अधार्मिक पातकादि दोषवर्जित) यजमान का त्याग करे, वह (त्यागकर्त्ता यजमान या पुरोहित) १००-१०० पण से दण्डनीय होता है।
माता, पिता, स्त्री और पुत्र त्याग के योग्य नहीं हैं, (अतएव अपतित) इनमें से किसी का त्याग करने वाले को राजा ६०० पण से दण्डित करे।
(गार्हस्थ्यादि) आश्रम-सम्बन्धी धार्मिक विषयों में (“शास्त्र का ऐसा अभिप्राय है, तुम्हारे कहने के अनुसार नहीं है” इत्यादि रूप में) परस्पर विवाद करते हुए द्विजातीयों के कार्य में अपना हित चाहने वाला राजा “इस प्रकार धर्म (शास्त्रवचन) है” ऐसा कोई निर्णय न करे।
राजा यथोचित पूजा (आदर-सत्कार) कर ब्राह्मणों के साथ सान्त्व (शमप्रधान) वचनों से उन्हें शान्त करके इनका अपना जो धर्म है, उसे समझावे।
किसी शुभ कार्य में बीस ब्राह्मणों को भोजन कराना हो तो प्रतिवेशी और :अनुवेशी योग्य ब्राह्मणों को नहीं भोजन कराने वाला ब्राह्मण एक मासे चाँदी से दण्डनीय होता है।
प्रतिवेशी या अनुवेशी सज्जन श्रोत्रिय को विवाहादि शुभ कार्यो में नहीं भोजन कराने वाले श्रोत्रिय से (राजा) उस (भोजन नहीं कराये गये) श्रोत्रिय के लिए दुगुना अन्न तथा एक मासा सोना दण्ड स्वरूप दिलवावे।
अन्धा, जड़, पङ्ग, सत्तर वर्ष से अधिक बूढ़ा और अन्न आदि से श्रोत्रियों का उपकार करते रहने वाला, इन लोगों से कोई (क्षीणकोष वाला भी) राजा कर (टैक्स) नहीं लेवे।
श्रोत्रिय (विद्वान्‌ तथा आचारवान्‌ ब्राह्मण) रोगी, (पुत्रादि के विरह से) दुःखी, बालक, बृद्ध, दरिद्र, श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न और उत्तम चरत्रि वाले की राजा सदैव पूजा (दान, मान आदि हिताचरण से सत्कार) करता रहे।
धोबी सेमल की लकड़ी के बने हुए चिकने पाढ (मोटे तख्ते) पर धीरे-धीरे कपड़ों को धोवे, किसी के कपड़े को दूसरों के कपड़ों में नहीं मिलावे और दूसरे को पहनने के लिए नहीं देवे। (यदि वह ऐसा नहीं करे तो राजा के द्वारा दण्डनीय होता है)।
कपड़ा बुनने वाला (जुलाहा आदि) दश पल सूत के बदले में (माँड़ी आदि लगने में बढ़ जोने के कारण) ग्यारह पल कपड़ा दे, इसके विपरीत करने (कम कपड़ा देने) वाले को राजा बारह पण (८।१३६) दण्ड दिलवावे (तथा स्वामी अर्थात्‌ सूत के बदले में कपड़ा लेने वाले को उचित कपड़ा दिलवाकर सन्तुष्ट करे)।
स्थल तथा जल के मार्ग से व्यापार करने में चतुर और बाजार के सौदों के मूल्य लगाने में निपुण व्यक्ति बाजार के अनुसार जिस वस्तु का जो मूल्य निश्चित करे, उसके लाभ में से राजा बीसवाँ भाग कर रूप में ग्रहण करे।
राजा से सम्बद्ध विक्री करने योग्य विख्यात (बर्तन या रोजोपयोगी हाथी, घोड़ा, गाड़ी आदि) सामान तथा निर्यात (निकासी) के लिए मना किये गये पदार्थ (यथादुर्भिक्ष के कारण अन्नादि, पशूत्रति आदि के लिए गाय, भैंस, बैल आदि या इसी प्रकार अन्याय पदार्थ) को लोभ (अधिक लाभ होने की आशा) से दूसरे देश (या स्थान) में ले जाने वाले व्यापारी की सम्पूर्ण सम्पत्ति को राजा हरण (जप्त) कर ले।
शुल्क (चुङ्गी-कस्टम) से बचने के लिए चुङ्गीघर का रास्ता छोड़कर दूसरे रास्ता से सौदा ले जाने वाला, असमय (रात्रि आदि में गुप्त रूप से) विक्रय करने वाला; (चुङ्गी कम लगने के लिए) तौल, माप या मूल्य को झूठ (कम) बतलाने वाला व्यापारी चुङ्गी के वास्वविक मूल्य के अठगुने द्रव्य से दण्डनीय होता है।
(राजा) आयात-निर्यात की दूरी, स्थान, कितने दिनों तक रखे रहने से कितना लाभ होगा, कितना बढ़ेगा, कर्मचारियों या अन्य कुली आदि तथा कीड़े आदि के कारण कितना माल घटेगा; इत्यादि सब बातों का विचारकर बाजार में बेचने योग्य सब सौदों (अन्न, वस्त्र, शस्त्र, काष्ठ आदि सामान) का मूल्य निश्चित कर उनका क्रयविक्रय (खरीद, बेची) करावे।
राजा पाँच-पाँच या पन्द्रह-पन्द्रह दिनों के बाद मुख्य व्यापारियों के सामने (उनसे विचार विनिमय करके सौदों के) मूल्य का निर्धारण करता रहे।
तुलामान, प्रतीमान और तराजू की राजा अच्छी तरह जाँचकर परीक्षा करे तथा प्रति छ: मास पर उनकी जाँच कराता रहे।
(नदी आदि को) नाव से पार करने में मनुष्य गाड़ी का एक पण, एक आदमी के बोझ (लगभग एक मन) का आधा पण, गौ आदि पशु तथा स्त्री का चौथाई पण तथा खाली (बोझ रहित) मनुष्य का अष्टमांश पण (८।१३६) नाव का भाड़ा (खेवाई) देवे।
सामान से भरी हुई गाड़ी या ठेले आदि की खेवाई उनके हलकापन तथा भारीपन के अनुसार देवे तथा खाली बर्तन और दरिद्र मनुष्य का भाड़ा जो भी कुछ अर्थात्‌ अत्यन्त थोड़ा देवे।
दूर तक जाने के लिए नदी की प्रबलता (तेज बहाव), स्थिरता, गर्मी तथा वर्षा आदि के समय के अनुसार नावभाड़ा (खेवाई) होता है; इसको नदी-तट के लिए समझना चाहिए। समुद्र में नदी से भिन्न स्थिति होने से यह नियम (८।४०४-४०५) नहीं है (अतएव उसका भाड़ा उचित ही लेना चाहिये)।
दो मास से अधिक गर्भवाली स्त्री, संन्यासी, ब्राह्मण और ब्रह्मचारी से नदी के पार जाने में कोई नावभाड़ा नहीं लेना चाहिये।
मल्लाहों की गलती से जो सामान नाव में नष्ट हो जाय, उसकी पूर्ति सब मल्लाहों को मिलाकर अपने-अपने हिस्से में से करनी चाहिये।
(भृगुजी ऋषियों से कहते हैं कि) नाव से पार जाने वालों के लिए यह निर्णय कहा गया है। नाविकों (नाव पर काम करने वाले) मल्लाहों की असावधानी से नष्ट हुए सामान के देनदार नाविक होते हैं, किन्तु दैवी उपद्रव (आँधी-तूफान आदि) से सामान के नष्ट होने पर उसके देनदार नाविक नहीं होते, वह हानि नष्ट हुए सामान के स्वामी को ही भोगनी पड़ती है।
राजा वैश्यों से व्यापार, व्याज (सूद) की जीविका, खेती तथा पशु-पालन और शूद्रं से द्विजों की सेवा करावे।
जीविका (के अभाव) से दुःखित क्षत्रिय तथा वैश्य को, उनसे अपनी जाति के अनुसार रक्षण तथा खेती आदि करवाता हुआ धनवान्‌ ब्राह्मण करुणापूर्वक पालन करे।
सम्पत्तिशाली होने के कारण यदि ब्राह्मण लोभ से यज्ञोपवीत संस्कार युक्त द्विज से उसकी इच्छा के बिना दासकर्म करावे तो वह ब्राह्मण राजा के द्वारा ६०० पण (८।१३६) से दण्डनीय होता है।
किन्तु बेतन देकर या नहीं देकर (जैसा वे चाहें वैसा करके) शूद्र से दास कर्म को करावे; क्योंकि ब्रह्मा ने ब्राह्मणों की सेवा के लिए शूद्रों की सृष्टि की है।
स्वामी के द्वारा छोड़ा गया भी शूद्र दासत्व से छुटकारा नहीं पाता है, क्योंकि वह (दासत्व), उसका स्वाभाविक कर्म है, (अतएव) उस (दासत्व कर्म) से उसको कौन मुक्त कर सकता है? अर्थात्‌ कोई नहीं।
(१) युद्ध में स्वामी के पास से जीता गया, (२) भोजन करने आदि के लोभ से आया हुआ, (३) दासी-पुत्र, (४) मूल्य देकर खरीदा गया, (५) किसी के देने से प्राप्त हुआ, (६) पिता की परम्परा से चला आता हुआ, (७) दण्ड (ऋण आदि) को चुकाने के लिए स्वीकृत किया गया, दासों की ये सात योनियाँ (कारण) हैं।
स्त्री, पुत्र तथा दास - इन तीनों को (मनु आदि महर्षियों ने) निर्धन ही कहा है, ये जो कुछ उपार्जन करते हैं, वह उसका होता है जिसके वे (भार्या, पुत्र या दास) हैं।
ब्राह्मण बिना विकल्प किये (दास) शूद्र से धन को ले लेवे, क्योंकि उस (दास शूद्र) का निजी धन कुछ नहीं है और वह (दास शूद्र) स्वामी से ग्रहण करने योग्य धन वाला है अर्थात्‌ उस शूद्र के धन को ग्रहण का अधिकार उसके स्वामी को है।
राजा वैश्य तथा शूद्र से यत्नपूर्वक अपने-अपने कर्मो (वैश्य से व्यापार, पशु पालन और खेती आदि तथा शूद्र से द्विजसेवा) को करवाता रहे, क्योंकि अपने-अपने कर्म से भ्रष्ट ये दोनों (वैश्य तथा शूद्र, अन्यायोपार्जित धनादि के अभिमान से) इस संसार को क्षुभित कर देंगे।
राजा प्रतिदिन (उन-उन विभागीय अधिकारियों के द्वारा) आरम्भ किये गये कार्यो की समाप्ति, हाथी-घोड़ा आदि वाहन, आय, व्यय, (कोयला, अभ्रक, लोहा सोना आदि की) खान और कोष- अनेक कार्य में फँसे रहने पर भी सदैव देखता रहे।
इस प्रकार सब व्यवहारों को समाप्त (पूरा) करता हुआ राजा सब पापों को दूर कर उत्तम गति को प्राप्त करता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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