अध्याय 8 — अष्टम अध्याय
मनुस्मृति
420 श्लोक • केवल अनुवाद
(न्यायाधीश) बाहरी चिह्लों से, स्वर (बोलने के समय रुकना घबड़ाना, गद्दगद होना आदि) वर्ण (मुख का उदास या प्रसन्न होना आदि), इङ्गित (सामने नहीं देख सकना अर्थात् नीचे की ओर से इधर, उधर देखना), आकार (कम्पन, स्वेद, रोमाञ्च आदि का होना) और चेष्टित (हाथों को मलना, अङ्गुलियों को चटकाना, अङ्गों को मरोड़ना आदि) से मनुष्यों (अर्थी, प्रत्यर्थी, साक्षी आदि) के भीतरी भावों को मालूम करे।
आकाश, भूमि, जल, हृदय, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात्रि, दोनों सन्ध्याएँ (प्रात: सन्ध्या तथा सायं सन्ध्या) और धर्म - ये शरीरधारियों के व्यवहार (शुभाशुभ कर्म) को जानते हैं।