न त्वेवाधौ सोपकारै कौसीदी वृद्धिमाप्नुयात् ।
च चाधेः कालसंरोधान्निसर्गोऽस्ति न विक्रयः ।।
भूमि (घर या खेत) तथा गौर आदि रेहन (गिरवी) रखकर ऋण लेने पर उनका उपभोग करता हुआ ऋणदाता ऋणी (ऋण लेनेवाले) से सूद नहीं लेता तथा अधिक समय बीत जाने पर (मूलधन राशि के दुगुना हो जाने पर) भी ऋणदाता रेहन रखी हुई सम्पत्ति (भूमि गोधन, आदि) को न तो किसी दूसरे को देने का अधिकारी है और न बेचने का।
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