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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 95
यस्य विद्वान्‌ हि वदतः क्षेत्रज्ञो नातिशङ्कते । तस्मिन्न देवाः श्रेयांसं लोकेऽन्यं पुरुषं विदुः ।।
गवाही में बोलतु हुए जिस मनुष्य का सर्वज्ञ अन्यर्यामी (यह असत्य बोलता है या सत्य' ऐसी शङ्का नहीं करता, किन्तु यह सत्य ही बोलता है, ऐसा) निःशङ्क रहता है अर्थात्‌ गवाही देनेवाले मनुष्य के मन में कोई शङ्का नहीं होती; संसार में उससे अधिक श्रेष्ठ किसी दूसरे को देवता लोग नहीं मानते हैं।
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