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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 213
दत्तस्यैषोदिता धर्म्या यथावदनपक्रिया । अत ऊर्ध्व प्रवक्ष्यामि वेतनस्यानपक्रियाम्‌ ॥
(महर्षि भृगुजी ऋषिओं से कहते हैं कि-) दिये गये धन को नहीं लौटाने पर यह धर्मयुक्त विधान कहा, इसके बाद वेतन नहीं देने पर विधान को मैं कहूँगा।
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