तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्रवणानि च । सीमासन्धिषु कार्याणि देवतायतनानि च ।।
(राजा) तडाग, कुएँ, बावड़ी झरने और देवों के मन्दिरों को दो सीमाओं के सन्धि-स्थल बनवावे ।
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