धर्मज्ञ (राजा) जातिधर्म (ब्राह्मणादि के लिए यज्ञ करना-कराना आदि) देशधर्म (देशानुसार शाख्रानुकूल व्यवस्थित धर्म) श्रेणिधर्म (वनिया अर्थात् व्यापारी आदि के लिए नियत धर्म-विशेष) और कुलधर्म (वंशपरम्परानुसार नियत धर्म) को देखकर तदनुसार उनके अपने-अपने धर्म की व्यवस्था करे।
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