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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 337
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्ण वाऽपि शतं भवेत्‌ । द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तदह्दोषगुणविद्धि सः ।।
ब्राह्मण को चौसठ-गुना या सौ गुना या एकसौ आड्टाइस गुना पाप होता है; क्योंकि वह उस (चोरी) के गुण और दोष का जानकार है। (अतएव अपराधानुसार उक्त शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण उत्तरोत्तर दण्डनीय होते हैं)
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