अभयस्य हि यो दाता स पूज्यः सततं नृपः ।
सत्रं हि वर्धते तस्य सदैवाभयदक्षिणम् ।।
जो राजा (प्रजाओं को चोरों से) अभय करने वाला है वह अवश्यमेव पूज्य (प्रशंसनीय) है; क्योंकि उस (चोरों से अभय करने वाले राजा) का अभयरूपी दक्षिणा वाला यज्ञ सर्वदैव बढ़ता है।
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