सत्यमर्थ च सम्पश्येदात्मानमथ साक्षिणम् ।
देशं रूपं च कालं च व्यवहारविधौ स्थितः ।।
व्यवहार अर्थात् मुकदमा देखने के लिए तैयार राजा सत्य से युक्त व्यवहार को, अपने को, (अन्याय करने से स्वर्गादि प्राप्ति नहीं होगी इत्यादि) साक्षियों (गवाह) को; देश, काल के अनुसार स्वरूप (छोटा या बड़ा इत्यादि) को देखे।
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