मत्तोन्मत्तार्त्ताध्यधीनैर्बालेन स्थविरेण वा ।
असम्बद्धकृतश्चैव व्यवहारो न सिध्यति ।।
मत्त (मदिरा आदि के नशे से मतवाला), उन्मत्त (पागल), रोगी, सेवक, बालक (१६ वर्ष से कम आयु वाला अर्थात् नाबालिग), और बूढ़ा-इनको पिता-भाई आदि सम्बन्धियो की सम्मति के बिना दिया गया ऋण व्यवहार (शास्त्र मर्यादा) के प्रतिकूल होता है।
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