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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 63
नार्थसम्बन्धिनो नाप्ता न सहाया न वैरिणः । न दृष्टदोषाः कर्त्तव्या न व्याध्यार्ता न दूषिताः ।।
ऋणादि के देने या लेने के सम्बन्ध वाले, मिश्र, सहायक (नौकर आदि), शत्रु (मुद्दालह का विरोधी), जिसने दूसरे किसी बात में झूठी गवाही दी हो वह, रोगपीड़ित तथा महापातक आदि से दूषित लोगों को साक्षी न बनावे।
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