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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 115
वत्सस्य ह्यभिशस्तस्य पुरा भ्रात्रा यवीयसा । नाग्निर्ददाह रोमापि सत्येन जगतः स्पशः ।।
पूर्वकाल में (सौतेले) छोटे भाई के द्वारा "तुम ब्राह्मण नहीं हो, शूद्र की संतान हो" ऐसा दूषित वत्स ऋषि के रोम को (भी संसार के शुभाशुभ जानने में) गुप्तचर रूप अग्नि ने सत्य के कारण से नहीं जलाया।
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