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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 104
वाग्दैवत्यैश्च चरुभिर्यजेरंस्ते सरस्वतीम्‌ । अनृतस्यैनसस्तस्य कुर्वाणा निष्कृतिं पराम्‌ ।।
उस असत्य का निवारण करते हुए वे (असत्य कहनेवाले साक्षी) चरुओं से वाणी है देवता जिसकी ऐसा सरस्वती का याग करें।
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