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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 126
अधर्मदण्डनं लोके यशोघ्नं कीर्तिनाशनम्‌ । अस्वर्ग्यं च परत्रापि तस्मात्तत्परिवर्जयेत्‌ ।।
धर्मविरुद्ध दिया गया दण्ड (राजा) के यश (जीवित अवस्था में प्रसिद्धि) तथा कीर्ति (मरने पर प्रसिद्धि) का नाश करनेवाला तथा परलोक में भी दूसरे धर्म से प्राप्त होनेवाले स्वर्ग का प्रतिबन्धक है; अतएव उसका त्याग करना चाहिए।
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