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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 138
ऋणे देये प्रतिज्ञाते पञ्चकं शतमर्हति । अपह्ववे तद्द्विगुणं तन्मनोरनुशासनम्‌ ।।
(न्यायालय में ऋण लेनेवाले के) ऋण लेना स्वीकार कर लेने पर ऋण द्रव्य का पाँच प्रतिशत और असत्यता से ऋण लेना स्वीकार नहीं करने पर उसे दश प्रतिशत दण्डित करना चाहिये, ऐसा मनु भगवान्‌ का आदेश है।
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