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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 197
अवहायों भवेच्चैव सान्वयः षट्शतं दमम्‌ । निरन्वयोऽनपसरः प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम्‌ ।।
यदि दूसरे की वस्तु उक्त प्रकार (८।१९३) से बेचनेवाला (उस बेची गयी वस्तु के स्वामी के) वंश का (पुत्र आदि सम्बन्धी) हो तो उसे राजा ६०० पण दण्ड (जुर्माना) करे और उस बेची गयी वस्तु के स्वामी के वंश का नहीं हो और उस वस्तु के स्वामी या उसके पुत्र आदि से वह (बेची गयी) वस्तु दान में या बेचने से नहीं मिली हो तो उस वस्तु को बेचनेवाला वह मनुष्य चोर के पाप को प्राप्त करता है अर्थात्‌ राजा को उसे चोर के समान दण्डित करना चाहिये।
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