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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 363
किञ्चिदेव तु दाप्यः स्यात्सम्भाषां ताभिराचरन्‌ । प्रेष्यासु चैकभक्तासु रहः प्रव्रजितासु च ।।
(तथापि चरणादि की स्त्रियों, दासियों, बौद्धमतावलम्बिनी स्त्रियो, ब्रह्म चारिणियों से एकान्त में बातचीत करते हुए मनुष्यों को राजा साधारणतम दण्डित करे, (क्योंकि ये सब भी परस्त्री ही हे, अतएव उनके साथ एकान्त में बातचीत करने से दोष लगता ही है)।
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