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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 102
तद्ददन्‌ धर्मतोऽर्थेषु जानन्नप्यन्यथा नरः । न स्वर्गाच्च्यवते लोकाद्दैवीं वाचं वदन्ति ताम्‌ ।।
बात को जानता हुआ धर्म (दया, जीवरक्षा आदि) के कारण आगे वक्ष्यमाण विषयों में अन्यथा कहनेवाला मनुष्य स्वर्गलोक से भ्रष्ट नहीं होता अर्थात्‌ धर्मबुद्धि से असत्य साक्षी देनेवाले का स्वर्ग नहीं बिगड़ता है। (मनु आदि महर्षिगण) उस वाणी को दैवी (देव-सम्बन्धिनी) वाणी कहते हैं।
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