केवल जाति (ब्राह्मणमात्र) होने से अन्य जाति की जीविका करनेवाला अर्थात् ब्राह्मण की वृत्ति को छोड़कर जीवन-निर्वाह के लिए क्षत्रिय या वैश्य का कार्य करनेवाला अथवा (ब्राह्मणत्व में सन्देह होने पर भी) अपने को ब्राह्मण कहनेवाला किसी व्यवहार (मुकदमें) को देखने में राजा का धर्मप्रवक्ता (न्यायाधीश) हो सकता है, किन्तु किसी प्रकार (ब्राह्मण का कर्म करता हुआ या धर्मात्मा) भी शूद्र धर्मप्रवक्ता नहीं हो सकता।
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