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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 58
यो यावन्निह्ल वीतार्थ मिथ्या यावति वा वदेत्‌ । तौ नृपेण ह्यधर्मज्ञौ दाप्यौ तद्द्विगुणं दमम्‌ ।।
जो प्रत्यर्थी (मुद्दालह) जितने धन को छिपावे अर्थात्‌ अधिक धन लेकर भी जितना कम बतलावे तथा जो अर्थी (मुद्दई) जितने धन को असत्य बोले अर्थात्‌ कम धन देकर भी जितने अधिक धन का दावा करे अधर्म को जाननेवाला राजा (या राज नियुक्त न्यायाधीश) उसका दुगुने धन से उन्हें दण्डित करे।
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