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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 145
सम्प्रीत्या भुज्यमानानि न नश्यन्ति कदाचन । धेनुरुष्ट्रो वहन्नश्वो यश्च दम्यः प्रयुज्यते ।।
प्रेम से उपभोग में लायी जाती हुई (दूध के लिए) गो, (सवारी करने या बोझ ढोने (लादने) के लिए) ऊंट तथा घोड़ा, हल आदि में जोतने योग्य बैल आदि पर से स्वामी का अधिकार कभी भी नष्ट नहीं होता अर्थात्‌ ग्रहण करनेवाले के उपभोग में आने पर भी उन पर मालिक का ही अधिकार रहता है।
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