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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 356
परस्त्रियं योऽभिवदेत्तीर्थेऽरण्ये वनेऽपि वा । नदीनां वाऽपि सम्भेदे स सङ्ग्रहणमाप्नुयात्‌ ।।
पहले परस्त्री-सम्भोग के विषय में अनिन्दित भी जो पुरुष नदी के किनारे (लता गुल्म आदि से घिरे हुए), अरण्य में, घने वृक्ष आदि से युक्त वन में, अथवा नदियों के सङ्गम स्थान अर्थात्‌ एकान्त में परस्त्री के साथ बातचीत करता है; वह पुरुष “स्त्रीसंग्रहण” (८।३५७) के दण्ड (१००० पण) से दण्डनीय है।
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