मिलकर काम करने वाले मनुष्यों (कारीगरों आदि) को इसी विधि (पूर्वोक्त यज्ञ-दक्षिणा भाग के अनुसार) (विज्ञान, व्यापार, कला आदि की कुशलता का ध्यान रखते हुए) हिस्से का बटवारा कर देना चाहिये।
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