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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 25
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च । नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ।।
आकार, इङ्गित, गमन, चेष्टा, भाषण तथा नेत्र एवं मुख के विकारों से (मनुष्यों का) भीतरी भाव मालूम होता है।
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