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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 305
रक्षन्धर्मेण भूतानि राजा वध्याश्च घातयन्‌ । यजतेऽहरहर्यज्ञैः सहस्रशतदक्षिणैः ।।
(निरपराध स्थावर-जङ्गम सब) जीवों की धर्मपूर्वक रक्षा करता हुआ तथा वधयोग्य जीवों का वध करता हुआ राजा प्रतिदिन सहस्रों-सैकड़ों दक्षिणा वाले यज्ञों को करता रहता है।
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