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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 143
न भोक्तव्यो बलादाधिर्भुञ्जानो वृद्धिमृत्सृजेत्‌ । मूल्येन तोषयेच्चैनमाधिस्तेनोऽन्यथा भवेत्‌ ।।
ऋणदाता बन्धक में रक्खी हुई वस्तु (वस्र, आभूषण आदि) का भोग न करे और यदि भोग करे तो वह ऋणी से उस वस्तु के ऋण का (८।१४०-१४२ में) कथित सूद न ले तथा यदि बन्धक रक्खी हुई वस्तु नष्ट-भ्रष्ट हो (टूट-फूट) जाय तो उसका मूल्य देकर ऋणी को सन्तुष्ट करे अन्यथा ऋण देनेवाले को बन्धक रक्खी हुई वस्तु की चोरी का पाप लगता है।
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