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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 275
ब्राह्मणक्षत्रियाभ्यां तु दण्डः कार्यो विजानता । ब्राह्मणे साहसः पूर्वः क्षत्रिये त्वेव मध्यमः ।।
दण्डशास्रज्ञ (राजा) ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के परस्पर में पातक-सम्बन्धी निन्दा करने पर (क्षत्रिय की निन्दा करने वाले) ब्राह्मण पर एक प्रथम साहस अर्थात्‌ २५० पण तथा (ब्राह्मण की निन्दा करने वाले) क्षत्रिय पर एक मध्यम साहस (८।१३८) अर्थात्‌ ५०० पण दण्ड करे।
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