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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 68
अनुभावी तु यः कश्चित्कुर्यात्साक्ष्यं विवादिनाम्‌ । अन्तर्वेश्मन्यरण्ये वा शरीरस्यापि चात्यये ।।
घर के भीतर, वन आदि में चोर आदि के शरीर में चोट आने या मारे जाने पर, जो भी कोई मिल जाय, उसे ही वादी और प्रतिवादी (मुद्द और मुद्दालह)दोनों पक्ष का साक्षी बनाना चाहिये (किन्तु ऋण आदि के लेन-देने में जिस किसी को साक्षी नहीं बनाना चाहिये।
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