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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 388
ऋत्विजं यस्त्यजेद्याज्यो याज्यं चर्त्विक्त्यजेद्यदि । शक्तं कर्मण्यदुष्टं च तयोर्दण्डः शतं शतम्‌ ।।
जो यजमान (कर्मानुष्ठान में समर्थ) पुरोहित का और पुरोहित (अधार्मिक पातकादि दोषवर्जित) यजमान का त्याग करे, वह (त्यागकर्त्ता यजमान या पुरोहित) १००-१०० पण से दण्डनीय होता है।
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