उक्त विधान (जमानतदार होने के कारण दिया जानेवाला ऋणदाता का धन जमानतदार के पुत्र को नहीं देना पड़ता) ऋणी को धनी के पास उपस्थित करने मात्र के लिए (जमानतदार) होने की अवस्था के लिए है; किन्तु यदि पिता यह कहकर प्रतिभू बना हो कि (यह ऋणी ऋण चुकता नहीं करेंगा तो इससे चुकता करवा दूँगा या में चुकता कर दूँगा) ऐसी अवस्था में ऋणी के द्वारा धनी (ऋणदाता) का ऋण नहीं देने पर पिता के मरने पर भी वह ऋण उस (प्रतिभू) के पुत्र को देना पड़ता है।
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