नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां विनिर्हरेत् ।
चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिता कायिका च या ।।
क्रणदाता ऋणी से पहले ही "प्रतिमास, प्रति दो मास, प्रति तीन मास तुम सूद दिया करना" ऐसा एक वर्ष तक का सूद चुकता कर देने का निर्णय करा ले, किन्तु एक वर्ष से अधिक समय का सूद एक बार में लेने का नियम कभी भी न करे और शास्त्र में (८।१३१-१४२) कहे हुए प्रमाण से अधिक सूद भी कभी नहीं ले; चक्रवृद्धि कालवृद्धि, कारित तथा कायिक सूद भी न ले।
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