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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 176
कर्मणाऽपि समं कुर्याद्धनिकायाधमर्णिकः । समोऽवकृष्टजातिस्तु दद्याच्छेयांस्तु तच्छनैः ।।
यदि ऋणी ऋण को देने में असमर्थ हो तथा ऋणदाता की जाति वाला या उसंसे छोटी जाति वाला हो तो वह ऋणी उस ऋणदाता के यहाँ (अपनी जाति के अनुरूप) काम करके ऋण को बराबर (चुकता) करे तथा यदि ऋणी ऋणदाता से बड़ी जातिवाला हो तो ऋणी को धीरे-धीरे (किस्तों में) चुकता करे।
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