(महर्षियों से भृगु जी कहते हैं कि--) मैंने यह (८।२७९-३००) दण्ड की कठोरता का निर्णय पूर्णतया कहा, अब इसके आगे (८।३०१-३४४) चोर के दण्ड के निर्णय का विधान कहुँगा।
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