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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 11
धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते । शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ।।
जिस सभा (न्यायालय) में धर्म (सत्य भाषण) अधर्म (असत्य भाषण) से पीड़ित होकर रहता है अर्थात्‌ असत्य बात कहकर सच्ची बात छिपायी जाती है, (और सभा में स्थित सदस्य) वे ब्राह्मण इस धर्म-पीडाकारक शल्य को दूर नहीं करते अर्थात्‌ असत्य पक्ष को छोड़कर सत्य पक्ष का आश्रय नहीं लेते, सभा में (सदस्य अर्थात्‌ न्यायाधीश रूप से) स्थित वे ब्राह्मण ही अधर्मरूपी शल्य से विद्ध (पीड़ित) होते हैं।
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