ग्रहीता यदि नष्टः स्यात्कुटुम्बे च कृतो व्ययः ।
दातव्यं बान्धवैस्तत्स्यात्प्रविभक्तैरपि स्वतः ।।
ऋणी यदि मर जाय तथा उसने ऋणद्रव्य को अलग हुए या सम्मिलित परिवार के लिए व्यय किया हो तो वह ऋण उस मृत ऋणी के अलग हुए या सम्मिलित परिवार वालों को चुकाना चाहिये।
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