धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतो वधीत् ।।
नष्ट किया गया धर्म ही (इष्ट-अनिष्ट के साथ) नष्ट करता है और सुरक्षित धर्म ही (इष्ट-अनिष्ट के साथ) रक्षा करता है, अत एव धर्म को (असत्य भाषण से) नष्ट नहीं करना चाहिये; क्योंकि नहीं नष्ट हुआ अर्थात् सुरक्षित धर्म ही नहीं मारता (रक्षा करता) है, अथवा - “नष्ट हुआ धर्म हम लोगों को नष्ट नहीं करे” यह जानकर धर्म को नष्ट नहीं करना चाहिये (अपितु असत्य भाषण करने वाले को दण्डित कर भाषण के द्वारा धर्म की रक्षा करनी चाहिये)।
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