जो पूर्वकथित विषय की दृढ़ता के लिए न्यायाधीश (या प्रतिपक्षी या उसके वकील आदि) से पूछे गये प्रश्नों (जिरहों) की चाहना न करे, जो कहे गये व्यवहारों को पहले नहीं कहकर इधर-उधर की बातें कहे, न्यायाधीश के “कहो?" ऐसा कहने पर भी जो नहीं कहे,
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