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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 206
दक्षिणासु च दत्तासु स्वकर्म परिहापयन्‌ । कृत्स्नमेव लभेतांशमन्येनैव च कारयेत्‌ ।।
(माध्यन्दिन यज्ञादि में) सब दक्षिणा लेकर अपने काम को (रोगादि के कारण-शठतादि दुर्भावना के कारण नहीं) छोड़ता हुआ ऋत्विक्‌ सब दक्षिणा का भागी होता है (इस अवस्था में यज्ञकर्ता को) बाकी कार्य दूसरों से करवाना तथा अलग दूसरी दक्षिणा उसको देनी चाहिये।
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