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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 186
अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थ प्रीतिपूर्वकम्‌ । विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिसाधयेत्‌ ।।
(उस धरोहर वापस लौटानेवाले पर और धरोहर बाकी रह जाने का संदेह होने पर उस धरोहर देनेवाले व्यक्ति का बान्धवादि उत्तराधिकारी) निष्कपट होकर प्रेमपूर्वक ही उस शेष बचे हुए धरोहर का निश्चय करे तथा उसके व्यवहार को विचार कर अर्थात्‌ "यह धर्मात्मा है" ऐसा मानकर साम के प्रयोग से ही निर्णय करे।
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