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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 101
गोरक्षकान्वाणिजकांस्तथा कारुकुशीलवान्‌ । रेष्यानवार्द्ध्षिकांश्चैव विप्रान्‌ शूद्रवदाचरेत्‌ ।।
गो-रक्षा, व्यापार, बढ़ई, लोहार या सूप-डाला आदि बनाने, नाचनेगाने, दास (सन्देश पहुँचाने) और निन्दित कर्म करने (या सूद लेने) की जीविका करनेवाले ब्राह्मणों से (साक्षी के विषय में प्रश्‍न करते समय राजा) शूद्र के समान वर्ताव करे।
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