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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 148
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधी स्त्रियः । राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ।।
बन्धक, सीमा (सरहद), बच्चे (नाबालिग) का धन, धरोहर, किसी बक्स आदि में रःकर मुहरबन्द करके रक्षार्थ सौंपी गयी वस्तु, सत्री (दासी आदि), राजा तथा श्रोत्रिय का धन इनका दूसरे के भोग करने पर भी उनका स्वामित्व नष्ट नहीं होता अर्थात्‌ उसको पाने का अधिकार उनके स्वामी को ही रहता है।
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