(भृगुजी ऋषियों से कहते हैं कि) यह (८।२६७-२७७) मैंने वाक्प्रारुष्य (कठोर वचन कहने) का यथार्थ दण्ड कहा है, इसके आगे दंडपारुष्य (मारने-पीटने आदि की कठोरता) का निर्णय कहुँगा।
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