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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 205
ऋत्विग्यदि वृतो यज्ञे स्वकर्म परिहापयेत्‌ । तस्य कर्मानुरूपेण देयोंऽशः सहकर्तृभिः ।।
यज्ञ में यदि वरण किया हुआ ऋत्विक्‌ (रोगादि के कारण) अपना काम नहीं करावे तो उसके किये गये काम के अनुसार बाकी काम को पूरा करनेवालों को उसका भाग देना चाहिये।
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