यत्किचिद्दशवर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी ।
भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ।।
अपनी सम्पत्ति को दूसरे के द्वारा अपने काम में लायी जाती हुई देखता हुआ भी स्वामी दश वर्षों तक कुछ नहीं कहता अर्थात् नहीं रोकता तो वह स्वामी उस सम्पत्ति को पाने का अधिकारी नहीं है।
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