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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 377
उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह । विप्लुतौ शूद्रवदृण्ड्यो दग्धव्यौ वा कटाग्निना ।।
(पति आदि से सुरक्षित तथा) गुणवती ब्राह्मणी के साथ यदि वे दोनों (वैश्य तथा क्षत्रिय) मैथुन करें तो वे शूद्र के समान (८।३७४) दण्डनीय हैं या तृणाग्नि में जलाने योग्य हैं।
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