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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 149
यः स्वामिनाऽ ननुज्ञातमाधिं भुङ्क्तेऽ विचक्षणः । तेनार्धवृद्धिर्मोक्तव्या तस्य भोगस्य निष्कृतिः ।।
बन्धक रक्खी हुई (वस्न, भूषण आदि) वस्तुओं का भोग जो नासमझ (व्यवहार ज्ञानशून्य) स्वामी की आज्ञा को नहीं पाकर करता हो, उसे उन वस्तुओं के भोग के बदले में आधा सूद लेना चाहिये।
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