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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 105
कूष्माण्डैर्वाऽपि जुहुयाद्घृतमग्नौ यथाविधि । उदित्यूचा वा वारुण्या तृचेनाब्दैवतेन वा ।।
अथवा (उक्त असत्य कहनेवाला साक्षी उक्त दोष के निवारणार्थ) कूष्माण्ड (यद्देवा देवहेडनम्‌ यजु० २०।१४) मन्त्रों से, या वरुण देवता को (वरुण हैं देवता जिसका ऐसे) “उदुत्तमं वरुणपाशम्‌ (यजु०१२।२)' मन्त्र से अथवा जल है देवता जिसका ऐसे 'आपो हि ष्ठा मयो भुवः? (यजु० १२।५०) मंत्र से विधिपूर्वक (स्वगृह्ोक्त परिस्तरणादि के साथ) अग्नि में हवन करे।
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