यस्मिन्कर्मणि यास्तु स्युरुक्ताः प्रत्यङ्गदक्षिणाः ।
स एव ता आददीत भजेरन्सर्व एव वा ।।
आधानादि जिन कर्मो में प्रत्येक अङ्ग की जो दक्षिण बतलायी गयी है, उनको वही (उस अङ्ग का कार्य करानेवाला ही) ऋत्विक् ले अथवा उन सब अङ्गों की दक्षिणाओं को विभक्तकर सब ऋत्विक् परस्पर में बाँट लें।
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