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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 274
मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम्‌ । आक्षारयञ्छतं दाप्यः पन्थानं चाददहुरोः ।।
(राजा) माता, पिता, स्री, भाई, पुत्र, गुरु को पातकादि का दोष लगाकर निन्दा करते हुए तथा गुरु के लिए मार्ग नहीं देते (किनारे होकर मार्ग नहीं छोड़ते) हुए व्यक्ति से सौ पण (८।१३६) दण्ड दिलवावे।
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