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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 125
अनुबन्धं परिज्ञाय देशकालौ च तत्त्वतः । सारापराधौ चालोक्य दण्डं दण्ड्येषु पातयेत्‌ ।।
(न्यायाधीश या राजा) बार-बार किये गये अपराध, देश (ग्राम, वन आदि) काल (रात-दिन आदि), अपराधी की शारीरिक तथा आर्थिक शक्ति और अपराध के गौरव-लाघव का वास्तविक विचार कर दण्डनीय व्यक्ति को दण्डित करे।
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